Sonam Wangchuk Hunger Strike: इस वक्त सोनम वांगचुक दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती हैं. साथ ही कॉकरोच जनता पार्टी का संसद मार्च चल रहा है. इसी बीच आपको बता दें कि शिक्षा सुधारक और इंजीनियर सोनम वांगचुक ने तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर की वजह से हो रही पानी की कमी का समाधान निकालने के लिए आइस स्तूप बनाया था. यह एक आर्टिफिशियल ग्लेशियर है जिसे सर्दियों में पानी जमा करने और किसानों को सबसे ज्यादा जरूरत होने पर उसे छोड़ने के लिए बनाया गया है. आइए जानते हैं कि यह कैसे काम करता है.
आइस स्तूप क्या है?
यह एक आर्टिफिशियल ग्लेशियर है जिसे सर्दियों में बेकार बह जाने वाले पानी को इकट्ठा करके और उसे एक ऊंचे कोन के आकार के ढांचे में जमा करके बनाया जाता है. पारंपरिक बांध या फिर जलाशय के उलट आइस स्तूप सर्दियों के महीनों में पानी को बर्फ के रूप में जमा करता है और गर्मियों की शुरुआत में पिघलने पर धीरे-धीरे उसे छोड़ता है.

इसका कोन जैसा आकार पारंपरिक बौद्ध स्तूप जैसा दिखता है जिसका एक व्यवहारिक मकसद भी है. सूरज की रोशनी के संपर्क में आने वाली सतह का क्षेत्रफल कम होने से पिघलने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है. इससे जमा हुआ पानी खेती के MAUSAM में ज्यादा समय तक काम आता है.
यह तकनीक कैसे काम करती है?
आइस स्तूप पूरी तरह से प्राकृतिक सिद्धांत पर काम करता है. इसके लिए बिजली या फिर पंप की जरूरत नहीं होती. सर्दियों के दौरान पहाड़ों की ऊंची धाराओं से पानी को पाइपलाइन के जरिए गांव की तरफ मोड़ा जाता है. क्योंकि स्रोत ऊंचाई पर होता है इस वजह से गुरुत्वाकर्षण स्वाभाविक रूप से पाइप के जरिए पानी को आगे बढ़ाने के लिए भरपूर दबाव बनाता है. गांव के पास पाइपलाइन को सीधा लगाया जाता है ताकि पानी फव्वारे की तरह ऊपर की तरफ निकले. लद्दाख में शून्य से नीचे के सर्दी के तापमान में पानी की बूंद लगभग तुरंत जम जाती है. जैसे-जैसे यह प्रक्रिया दिन-ब-दिन चलती रहती है बर्फ की परतें जमा होती रहती हैं और आखिर में जमे हुए पानी का एक ऊंचा कोन बन जाता है.
