ईरान, जिसे दुनिया सदियों तक फारस के नाम से जानती रही, आज एक इस्लामिक राष्ट्र है, लेकिन इस जमीन का इतिहास इस्लाम के आगमन से कहीं ज्यादा पुराना और गहरा है. कभी यह क्षेत्र ‘आतिशपरस्तों’ यानी आग की पूजा करने वालों का गढ़ हुआ करता था, जिसे मुसलमान ‘आतिशकदा’ कहते थे. आखिर क्यों इस पावन धरती को आग का घर कहा गया और फारस के सुनहरे दौर का पारसियों से क्या अटूट रिश्ता रहा है? आइए, इतिहास के पन्नों को पलटकर इस दिलचस्प कनेक्शन की तह तक जाते हैं.
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इतिहास के पन्नों में ईरान के लिए अक्सर आतिशकदा शब्द का इस्तेमाल मिलता है. फारसी और उर्दू साहित्य में ‘आतिश’ का मतलब आग और ‘कदा’ का मतलब घर या स्थान होता है. प्राचीन फारस में पारसी धर्म (Zoroastrianism) के अनुयायी रहते थे, जिनके लिए अग्नि ईश्वर की पवित्रता और प्रकाश का सबसे बड़ा प्रतीक थी.
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इन लोगों ने पूरे फारस में विशाल अग्नि मंदिर बनवाए थे, जहां पवित्र अग्नि को कभी बुझने नहीं दिया जाता था. इसी कारण अरब और अन्य क्षेत्रों के मुसलमानों ने इस पूरे भू-भाग को ‘आग का स्थान’ या ‘आतिशकदा’ कहना शुरू किया.
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इस्लाम के आने से पहले फारस दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों में से एक था. यहां हखामनी और ससानिद जैसे महान साम्राज्यों का शासन रहा है. इन साम्राज्यों की पहचान पारसी धर्म से थी, जिसकी स्थापना पैगंबर जरथुस्त्र ने की थी. पारसी धर्म दुनिया के सबसे पुराने एकेश्वरवादी धर्मों में से एक माना जाता है. इस धर्म में आग को पूजनीय माना गया है, क्योंकि इसे बुराई को खत्म करने वाला और पवित्रता का वाहक समझा जाता था.
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उस दौर में फारस का सामाजिक और राजनीतिक ढांचा पूरी तरह से इसी धर्म के सिद्धांतों पर आधारित था. मुसलमानों द्वारा फारस को आतिशकदा कहने के पीछे एक बड़ी वजह यहां के ‘अताश बेहराम’ थे. ये पारसी धर्म के सबसे ऊंचे दर्जे के अग्नि मंदिर होते थे. इन मंदिरों में आग को स्थापित करने की प्रक्रिया बेहद जटिल थी और इसे राजाओं का संरक्षण प्राप्त था.
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पारसियों का मानना था कि आग खुदा की ऊर्जा का भौतिक रूप है. उनके लिए फारस की जमीन सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि एक पवित्र केंद्र थी, जहां की हवाओं में जरथुस्त्र की शिक्षाएं गूंजती थीं. इसी सांस्कृतिक विशिष्टता ने फारस को पूरी दुनिया में एक अलग पहचान दिलाई.
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फारस शब्द का सीधा संबंध ‘पार्स’ क्षेत्र से है, जो आज के ईरान का एक प्रांत है. यहीं से पारसी समुदाय की पहचान निकली. आज हम जिसे ईरानी वास्तुकला या कला कहते हैं, उसकी जड़ें पारसी काल में ही जमी थीं. नौरोज जैसा बड़ा त्योहार, जो आज भी ईरान में सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है, असल में पारसी कैलेंडर का नया साल है.
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फारस के राजाओं ने साहित्य, खगोल विज्ञान और गणित में जो तरक्की की थी, वह पारसी विद्वानों की ही देन थी. यही वजह है कि आज भी इतिहासकार फारस और पारसी को एक-दूसरे का पूरक मानते हैं.
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सातवीं शताब्दी में जब अरबों ने फारस पर विजय प्राप्त की, तो वहां की धार्मिक तस्वीर बदलने लगी. ससानिद साम्राज्य के पतन के बाद इस्लाम तेजी से फैलने लगा. धीरे-धीरे पारसी धर्म के अनुयायियों की संख्या कम होने लगी. कई प्राचीन अग्नि मंदिर या तो मस्जिद में बदल दिए गए या उपेक्षित होकर खंडहर बन गए. इसी दौर में अपनी धार्मिक पहचान बचाने के लिए पारसियों का एक बड़ा समूह समुद्र के रास्ते भारत की ओर निकल पड़ा, जिन्हें आज हम भारत के ‘पारसी’ समुदाय के रूप में जानते हैं.
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समय के साथ फारस पूरी तरह इस्लामिक रंग में रंग गया और उसका नाम आधिकारिक रूप से ईरान हो गया. ‘आतिशकदा’ शब्द जो कभी एक वास्तविकता था, वह धीरे-धीरे शायरी और कहानियों का हिस्सा बन गया. हालांकि, आज भी ईरान के यज्द और किरमान जैसे शहरों में कुछ प्राचीन अग्नि मंदिर मौजूद हैं, जहां सदियों पुरानी आग आज भी दहक रही है. यह आग आज के ईरान को उसके गौरवशाली पारसी अतीत से जोड़ने वाली आखिरी कड़ी मानी जाती है.
