ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी भीषण मिसाइल जंग ने पूरी दुनिया को दहला दिया है. इस महायुद्ध का असली केंद्र ईरान तो है ही, लेकिन समंदर का वह संकरा हिस्सा भी अब केंद्र बन चुका है, जिसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज कहा जाता है. दुनिया के कुल तेल व्यापार का 30 प्रतिशत हिस्सा इसी 33 किलोमीटर चौड़े रास्ते से गुजरता है.
दोनों देशों से युद्ध के बीच ईरान ने अमेरिका और इजराइल के लिए इस संकरे गलियारे को बंद कर रखा है. इस वक्त स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों का ट्रैफिक जाम है, जिससे पूरी दुनिया में तेल संकट शुरू हो चुका है. ऐसे में सवाल उठता है कि हजारों साल से इस रणनीतिक रास्ते को चौड़ा करने की कोशिश क्यों नहीं हुई? अगर ऐसा किया गया तो दुनिया का भूगोल कैसे बदल जाएगा?

होर्मुज की भौगोलिक स्थिति और 3000 साल पुराना इतिहास
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच का यह एकमात्र समुद्री लिंक है, जो अरब प्रायद्वीप को ईरान से अलग करता है. पिछले 3000 साल से इसका भूगोल लगभग स्थिर है. इसकी सबसे कम चौड़ाई महज 33 किलोमीटर (21 मील) है, लेकिन असल में जहाजों के आने-जाने के लिए उपलब्ध रास्ता और भी संकरा है. अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, जहाजों के लिए केवल दो मील का शिपिंग लेन आने के लिए और दो मील का जाने के लिए सुरक्षित माना जाता है. इसके बीच में दो मील का बफर जोन रखा जाता है, ताकि जहाजों की टक्कर न हो.
चट्टानी किनारों और उथले पानी की चुनौती
इतिहास में इस रास्ते को चौड़ा न किए जाने का सबसे बड़ा कारण इसकी प्राकृतिक संरचना है. होर्मुज के दोनों ओर बड़ी-बड़ी पहाड़ी श्रृंखलाएं और डूबी हुई चट्टानें (Coral Reefs and Submarine Ridges) मौजूद हैं. ईरान की ओर जाग्रोस पर्वत की श्रृंखलाएं सीधे समंदर में उतरती हैं. वहीं, ओमान की ओर मुसंदन प्रायद्वीप की नुकीली चट्टानें खड़ी हैं. इन चट्टानों को काटना या समुद्र की गहराई बढ़ाना कोई साधारण इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट नहीं है. यह इतना महंगा और जटिल काम है कि दुनिया की कोई भी अर्थव्यवस्था इसका बोझ अकेले नहीं उठा सकती है.
