मिडिल ईस्ट में बारूद की गूंज के बीच अब कानूनी जंग को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हालिया हमलों, विशेष रूप से दक्षिण ईरान के मीनाब में एक गर्ल्स स्कूल पर गिरी मिसाइल ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को हिलाकर रख दिया है. इस हमले में 150 लोगों की मौत, जिनमें अधिकांश स्कूली छात्राएं थीं, ने युद्ध के नियमों पर बड़े सवाल उठाए हैं कि क्या ईरान इन हमलों को अंतरराष्ट्रीय अदालत में चुनौती दे सकता है?
संयुक्त राष्ट्र का चार्टर किसी देश को दूसरे पर हमला करने की इजाजत कब देता है और कब ये युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है? आइए, तथ्यों के आधार पर समझते हैं इस पूरी कानूनी पेचीदगी को.
क्या अमेरिका-इजरायल का हमला वैध है?
द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र (UN) की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी कि आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के दंश से बचाया जा सके. यूएन चार्टर का अनुच्छेद 2(4) स्पष्ट रूप से किसी भी सदस्य देश को दूसरे देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग करने से रोकता है. चार्टर के तहत केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ही किसी देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की अनुमति दे सकती है.
क्या कहता है अनुच्छेद 51?
इसका एकमात्र अपवाद अनुच्छेद 51 है, जो किसी देश को ‘आत्मरक्षा’ (Self-Defence) में बल प्रयोग की अनुमति देता है, लेकिन यहां एक पेंच है- आत्मरक्षा का अधिकार तभी मिलता है जब उस देश पर ‘वास्तविक सशस्त्र हमला’ हुआ हो. कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि चूंकि ईरान ने हाल ही में न तो अमेरिका पर हमला किया और न ही इजरायल पर, इसलिए ‘आत्मरक्षा’ की दलील यहां कमजोर पड़ती है. अमेरिका और इजरायल इसे निवारक (Pre-emptive) हमला बता रहे हैं, जिसका अर्थ है भविष्य में होने वाले संभावित खतरे को रोकना. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कानून में भविष्य के अनुमानित खतरे के आधार पर हमला करना विवादास्पद है.

निवारक आत्मरक्षा की शर्तें और ईरान की स्थिति
कानूनी विद्वानों के अनुसार, अगर निवारक आत्मरक्षा के सिद्धांत को माना भी जाए, तो इसके लिए तीन शर्तें पूरी होनी चाहिए: पहला, हमलावर देश ने हमले का पक्का मन बना लिया हो; दूसरा, उसके पास हमला करने की क्षमता हो; और तीसरा, हमला रोकना अभी अनिवार्य हो क्योंकि यह आखिरी मौका है.
ईरान के मामले में, जून 2025 के अमेरिकी हमलों के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम ‘नेस्तनाबूद’ हो चुका है. ऐसे में यह साबित करना मुश्किल है कि ईरान फिर से हमला करने की स्थिति में था, जो इस सैन्य कार्रवाई की कानूनी वैधता पर सवाल खड़ा करता है.
अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL) का उल्लंघन
युद्ध की शुरुआत भले ही किसी भी कारण से हुई हो, लेकिन युद्ध लड़ने के भी नियम होते हैं जिन्हें ‘इंटरनेशनल ह्यूमैनिटेरियन लॉ’ (IHL) कहा जाता है. मीनाब के गर्ल्स स्कूल पर हुई गोलाबारी ने ‘विभेद का सिद्धांत’ (Principle of Distinction) का उल्लंघन किया है. यह सिद्धांत कहता है कि हमलावरों को सैन्य ठिकानों और नागरिक ठिकानों (स्कूल, अस्पताल, पूजा स्थल) के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा. यदि किसी ठिकाने को लेकर संदेह हो कि वह सैन्य है या नागरिक, तो उसे ‘नागरिक’ ही माना जाना चाहिए.
