जंगल की खामोशी से निकलकर रंगों की खुली दुनिया में कदम रखना- यह नजारा देखने वालों की आंखें नम कर गया. छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में 30 से ज्यादा आत्मसमर्पित नक्सलियों ने पहली बार खुले आसमान के नीचे होली मनाई. कभी बंदूक थामने वाले ये हाथ आज गुलाल से रंगे नजर आए और हल्बी गीतों की धुन पर थिरकते दिखे. मानो वर्षों का बोझ आज रंगों के साथ धुल गया हो.
आत्मसमर्पित नक्सलियों ने पुलिस जवानों के साथ गले मिलकर होली खेली. माहौल में डर नहीं बल्कि अपनापन था. जो लोग कभी जंगलों में बंदूक लेकर घूमते थे वे आज एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाते और हंसते-मुस्कुराते नजर आए. खुले आसमान के नीचे स्वतंत्रता के बीच होली का यह उत्सव उनके लिए महज एक त्योहार नहीं बल्कि एक नई जिंदगी की शुरुआत का प्रतीक बन गया.
SP और कलेक्टर भी हुए शामिल, तिलक लगाकर दी बधाई
इस भावुक अवसर पर गरियाबंद के पुलिस अधीक्षक वेद व्रत सिरमौर और जिला कलेक्टर भगवान सिंह उईके भी शामिल हुए. दोनों अधिकारियों ने आत्मसमर्पित नक्सलियों के साथ रंग-गुलाल खेला और उनका हौसला बढ़ाया. अधिकारियों ने सभी को तिलक लगाकर होली की बधाई दी और मुख्यधारा में लौटने के उनके फैसले की सराहना की. अधिकारियों की इस भागीदारी ने पूर्व नक्सलियों को यह संदेश दिया कि समाज उन्हें अपनाने के लिए तैयार है.

पहले डर और अनिश्चितता, अब खुलकर जीने का मौका
पूर्व नक्सलियों ने पुलिस अधिकारियों का आभार जताते हुए कहा कि पहले उनकी जिंदगी डर और अनिश्चितता के साए में गुजरती थी. जंगल में हर पल खतरा, हर कदम पर अनिश्चितता और न कोई त्योहार न खुशी. लेकिन अब उन्हें खुलकर जीने और समाज के साथ आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है. रंगों के इस त्योहार ने सिर्फ उनके चेहरे ही नहीं बल्कि जिंदगी की दिशा भी बदल दी.
नई उम्मीद, नया विश्वास
यह होली इन आत्मसमर्पित नक्सलियों के लिए नए विश्वास, नई उम्मीद और नई शुरुआत का प्रतीक बन गई. हल्बी गीतों की मधुर धुन पर थिरकते इन पूर्व नक्सलियों को देखकर साफ दिखा कि मुख्यधारा में लौटने का उनका फैसला उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहा है. गरियाबंद की यह होली इस बात का उदाहरण है कि सही माहौल और अवसर मिले तो बंदूक थामने वाले हाथ भी गुलाल से रंग सकते हैं.
