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भारत में रविवार को कैसे माना गया था छुट्टी का दिन, जानें क्या थी इसकी वजह…

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Sunday Holiday: आज ज्यादातर भारतीयों के लिए रविवार का मतलब आराम, परिवार के साथ समय बिताना और काम से ब्रेक लेना होता है. लेकिन यह हफ्ते की छुट्टी हमेशा जिंदगी का हिस्सा नहीं थी. भारत में इसे ऑफिशियल पहचान 10 जून 1890 से मिली थी. भारत में रविवार कैसे छुट्टी का दिन बना इसकी कहानी ब्रिटिश राज के दौरान मजदूर आंदोलन से जुड़ी हुई है. आइए जानते हैं क्या है यह कहानी.

नारायण मेघाजी लोखंडे का संघर्ष 

ब्रिटिश राज के दौरान इंडस्ट्रियल मजदूरों को हफ्ते के सातों दिन बिना किसी हफ्ते के आराम के काम करने के लिए मजबूर किया जाता था. ऐसा बॉम्बे में मिल मजदूरों के साथ ज्यादा किया जाता था. लंबे घंटे, मुश्किल हालात और कोई पक्का ब्रेक न मिलने की वजह से रोजमर्रा की जिंदगी काफी मुश्किल हो चुकी थी. इसी माहौल में नारायण मेघाजी लोखंडे आगे आए.

उन्होंने मजदूरों की मुश्किलें देखीं और हफ्ते की छुट्टी की मांग करने लगे. 1881 और 1884 के बीच उन्होंने विरोध प्रदर्शन किए. इसी के साथ उन्होंने ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेशन को मेमोरेंडम दिए और मांग के सपोर्ट में करीब 10000 वर्कर्स को इकट्ठा किया. उनका कैंपेन करीब 7 साल तक चला. लगातार दबाव ने आखिरकार कॉलोनियल सरकार को जवाब देने पर मजबूर कर दिया. 10 जून 1890 को रविवार को ऑफीशियली भारत में वर्कर्स के लिए वीकली छुट्टी घोषित की गई. लेबर राइट्स के लिए यह एक बड़ी जीत थी.

 

 

रविवार को ही क्यों चुना गया? 

रविवार को चुनने का फैसला धार्मिक और प्रैक्टिकल दोनों वजहों से प्रभावित था. उस समय भारत पर राज करने वाले ब्रिटिश अधिकारी ईसाई धर्म को मानते थे. रविवार को ट्रेडिशनल प्रार्थना और चर्च जाने के दिन के रूप में मनाया जाता था. रविवार को छुट्टी देना ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेटिव रीति रिवाज के साथ जुड़ा हुआ था. हालांकि लोखंडे ने मांग को मजबूत करने के लिए कल्चरल तौर पर एक तर्क भी दिया. उन्होंने बताया कि रविवार हिंदू देवता खंडोबा से जुड़ा है और हिंदू ट्रेडीशन में यह सूर्य भगवान को भी समर्पित है. उनका कहना था कि जैसे ब्रिटिश अधिकारी अपने धार्मिक रीति रिवाज का पालन करते हैं वैसे ही भारतीय मजदूरों को भी हफ्ते में एक दिन आराम करने और अपने समाज और कम्युनिटी की जिंदगी में योगदान देने का हक है.

रविवार की छुट्टी की ग्लोबल जड़ 

रविवार को आराम करने के दिन के तौर पर मानने का कॉन्सेप्ट भारत में शुरू नहीं हुआ था. इसकी ग्लोबल जड़ें 321 एडी से जुड़ी हैं.  उस वक्त रोमन सम्राट कॉन्स्टेंटाइन द ग्रेट ने रोमन साम्राज्य में रविवार को ऑफीशियली आराम का दिन घोषित किया था. वक्त के साथ यह रिवाज पूरे यूरोप में फैल गया और बाद में ब्रिटिश इंडिया सहित कॉलोनियल एडमिनिस्ट्रेशन पर असर डाला.

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