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बस कुछ इंच और फिर खत्म हो जाएगा इनका वजूद! जानें समंदर में डूबने की कगार पर कितने देश?

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प्रकृति की सुंदरता का प्रतीक माने जाने वाले दुनिया के कई छोटे द्वीप देश आज अस्तित्व के सबसे बड़े संकट के मुहाने पर खड़े हैं. ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण जिस रफ्तार से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, वह किसी डरावने सपने से कम नहीं है. विशेषज्ञों और शोध रिपोर्टों के अनुसार, आने वाले कुछ दशकों में मालदीव, तुवालु और किरीबाती जैसे देश शायद दुनिया के नक्शे से मिट जाएं. यह केवल एक पर्यावरणीय चेतावनी नहीं है, बल्कि एक पूरे राष्ट्र के अस्तित्व के डूबने की दास्तान है, जो हमारे सामने घटित हो रही है.

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मालदीव, जो अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और नीले पानी के लिए दुनियाभर में मशहूर है, वह समुद्र तल से महज 1.5 मीटर की औसत ऊंचाई पर स्थित है. यह दुनिया का सबसे निचला देश है. नेशनल जियोग्राफिक की रिपोर्ट्स बताती हैं कि यदि समुद्र के जलस्तर में इसी गति से बढ़ोतरी जारी रही, तो 2050 तक मालदीव का 80 प्रतिशत से अधिक भूभाग जलमग्न हो सकता है.
मालदीव, जो अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और नीले पानी के लिए दुनियाभर में मशहूर है, वह समुद्र तल से महज 1.5 मीटर की औसत ऊंचाई पर स्थित है. यह दुनिया का सबसे निचला देश है. नेशनल जियोग्राफिक की रिपोर्ट्स बताती हैं कि यदि समुद्र के जलस्तर में इसी गति से बढ़ोतरी जारी रही, तो 2050 तक मालदीव का 80 प्रतिशत से अधिक भूभाग जलमग्न हो सकता है.
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यह संकट वहां की जनसंख्या के लिए विस्थापन का एक ऐसा दौर ला सकता है, जिसे संभालना वैश्विक स्तर पर एक बड़ी चुनौती होगी.
यह संकट वहां की जनसंख्या के लिए विस्थापन का एक ऐसा दौर ला सकता है, जिसे संभालना वैश्विक स्तर पर एक बड़ी चुनौती होगी.
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प्रशांत महासागर में स्थित किरीबाती 33 प्रवाल द्वीपों (कोरल आइलैंड्स) से बना एक सुंदर देश है, जो आज बेहद नाजुक स्थिति में है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगले 30 से 40 वर्षों में यह देश पूरी तरह से निर्जन हो सकता है, क्योंकि समुद्र का पानी उसकी जमीन को निगलता जा रहा है.
प्रशांत महासागर में स्थित किरीबाती 33 प्रवाल द्वीपों (कोरल आइलैंड्स) से बना एक सुंदर देश है, जो आज बेहद नाजुक स्थिति में है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगले 30 से 40 वर्षों में यह देश पूरी तरह से निर्जन हो सकता है, क्योंकि समुद्र का पानी उसकी जमीन को निगलता जा रहा है.
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इसी तरह तुवालु का हाल और भी चिंताजनक है. अनुमान है कि 2100 तक ऊंचे ज्वार के दौरान तुवालु का 95 प्रतिशत हिस्सा समुद्र के नीचे होगा. इन देशों के लोग आज अपनी जमीन बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुहार लगा रहे हैं, लेकिन बढ़ते पानी का स्तर उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है.
इसी तरह तुवालु का हाल और भी चिंताजनक है. अनुमान है कि 2100 तक ऊंचे ज्वार के दौरान तुवालु का 95 प्रतिशत हिस्सा समुद्र के नीचे होगा. इन देशों के लोग आज अपनी जमीन बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुहार लगा रहे हैं, लेकिन बढ़ते पानी का स्तर उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है.
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मार्शल आइलैंड्स के लिए जलस्तर में सिर्फ एक मीटर की वृद्धि तबाही लाने के लिए काफी है. इस वृद्धि से राजधानी माजुरो की 40 प्रतिशत इमारतें स्थायी रूप से डूब सकती हैं.
मार्शल आइलैंड्स के लिए जलस्तर में सिर्फ एक मीटर की वृद्धि तबाही लाने के लिए काफी है. इस वृद्धि से राजधानी माजुरो की 40 प्रतिशत इमारतें स्थायी रूप से डूब सकती हैं.
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वहीं, दक्षिण प्रशांत का देश वानुअतु भी 2100 तक पानी में पूरी तरह समाने के कगार पर है. ये देश न केवल अपने घर खो रहे हैं, बल्कि अपनी संस्कृति, इतिहास और अपनी पहचान को भी समुद्र की लहरों में विलीन होता देख रहे हैं. इन देशों के पास अपनी जमीन को बचाने के लिए बहुत सीमित भौगोलिक संसाधन हैं.
वहीं, दक्षिण प्रशांत का देश वानुअतु भी 2100 तक पानी में पूरी तरह समाने के कगार पर है. ये देश न केवल अपने घर खो रहे हैं, बल्कि अपनी संस्कृति, इतिहास और अपनी पहचान को भी समुद्र की लहरों में विलीन होता देख रहे हैं. इन देशों के पास अपनी जमीन को बचाने के लिए बहुत सीमित भौगोलिक संसाधन हैं.
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समुद्र का स्तर बढ़ने के पीछे मुख्य तौर पर दो बड़े कारण जिम्मेदार है- ध्रुवों पर जमी बर्फ का तेजी से पिघलना और गर्म होने के कारण महासागरों के पानी का फैलना (थर्मल एक्सपेंशन). 2013 से 2022 के बीच समुद्र स्तर प्रति वर्ष 4.62 मिलीमीटर की दर से बढ़ा है, जो कि चिंताजनक रूप से तीव्र है.
समुद्र का स्तर बढ़ने के पीछे मुख्य तौर पर दो बड़े कारण जिम्मेदार है- ध्रुवों पर जमी बर्फ का तेजी से पिघलना और गर्म होने के कारण महासागरों के पानी का फैलना (थर्मल एक्सपेंशन). 2013 से 2022 के बीच समुद्र स्तर प्रति वर्ष 4.62 मिलीमीटर की दर से बढ़ा है, जो कि चिंताजनक रूप से तीव्र है.
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इसके अलावा, ‘किंग टाइड्स’ यानी अत्यधिक ऊंचे ज्वार अब इन देशों के तटों पर पहले की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी साबित हो रहे हैं, जिससे जमीन का कटाव और बाढ़ की समस्या विकराल हो गई है.
इसके अलावा, ‘किंग टाइड्स’ यानी अत्यधिक ऊंचे ज्वार अब इन देशों के तटों पर पहले की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी साबित हो रहे हैं, जिससे जमीन का कटाव और बाढ़ की समस्या विकराल हो गई है.

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