पांच फरवरी को सौंदला में एक विशेष ग्रामसभा आयोजित की गई. बैठक की अध्यक्षता ग्राम प्रधान शरद बाबूराव अरगड़े ने की. इस बैठक में गांव के सभी लोग उपस्थित हुए और सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि अब गांव में किसी भी सरकारी या सामाजिक कार्यक्रम में जाति का उल्लेख नहीं किया जाएगा. ग्रामीणों का मानना है कि जाति समाज को बांटती है और विकास के लिए सभी को एकजुट होना जरूरी है. इसलिए उन्होंने फैसला किया कि गांव की पहचान अब जाति से नहीं बल्कि इंसानियत और नागरिकता से होगी.पांच फरवरी को सौंदला में एक विशेष ग्रामसभा आयोजित की गई. बैठक की अध्यक्षता ग्राम प्रधान शरद बाबूराव अरगड़े ने की. इस बैठक में गांव के सभी लोग उपस्थित हुए और सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि अब गांव में किसी भी सरकारी या सामाजिक कार्यक्रम में जाति का उल्लेख नहीं किया जाएगा. ग्रामीणों का मानना है कि जाति समाज को बांटती है और विकास के लिए सभी को एकजुट होना जरूरी है. इसलिए उन्होंने फैसला किया कि गांव की पहचान अब जाति से नहीं बल्कि इंसानियत और नागरिकता से होगी.
पांच फरवरी को सौंदला में एक विशेष ग्रामसभा आयोजित की गई. बैठक की अध्यक्षता ग्राम प्रधान शरद बाबूराव अरगड़े ने की. इस बैठक में गांव के सभी लोग उपस्थित हुए और सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि अब गांव में किसी भी सरकारी या सामाजिक कार्यक्रम में जाति का उल्लेख नहीं किया जाएगा. ग्रामीणों का मानना है कि जाति समाज को बांटती है और विकास के लिए सभी को एकजुट होना जरूरी है. इसलिए उन्होंने फैसला किया कि गांव की पहचान अब जाति से नहीं बल्कि इंसानियत और नागरिकता से होगी.

सौंदला में इस बदलाव की शुरुआत गांव के शिक्षित युवाओं ने की थी. उन्होंने देखा कि चुनाव, सामाजिक या धार्मिक उत्सवों में अक्सर जाति का सवाल उठता है और यह रिश्तों में दूरी पैदा करता है. युवाओं ने बुजुर्गों से कहा कि अगर गांव का असली विकास चाहिए, तो हमें जाति की पुरानी बेड़ियों को तोड़ना होगा. धीरे-धीरे सभी बुजुर्गों ने इस विचार को स्वीकार किया और पूरे गांव ने मिलकर इसे अपनाया.
ग्रामसभा के निर्णय के अनुसार अब गांव के बच्चे स्कूलों में नामांकन के समय जाति दिखाने वाले उपनाम की जगह केवल पिता का नाम या भारतीय शब्द यूज करेंगे. इसका मकसद है कि नए बच्चों को शुरू से ही यह सीख मिले कि उनकी पहचान जाति से नहीं, इंसानियत से है.
अब गांव में सामाजिक उत्सवों और समारोहों में अलग-अलग जातियों के लिए अलग टोलियों की व्यवस्था नहीं होगी. इसके बजाय एक पंगत की परंपरा अपनाई जाएगी मंदिरों, कुओं और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर भी किसी विशेष जाति का वर्चस्व नहीं होगा और सभी ग्रामीण समान रूप से इनका यूज कर सकेंगे.
