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Gripen Price: एक ग्रिपेन फाइटर जेट की कीमत कितनी, यह राफेल से कम है या ज्यादा?

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Gripen Price: इंडियन एयर फोर्स अपने फाइटर फ्लीट को मॉडर्न बनाने और बढ़ाने के लिए ऑप्शन तलाश रही है. इसी बीच स्वीडिश डिफेंस कंपनी Saab AB फ्रांसीसी डसॉल्ट राफेल के किफायती विकल्प के तौर पर भारत को अपना एडवांस्ड Saab JAS 39 ग्रिपेन ऑफर किया है. इस बीच एक जरूरी सवाल लोगों के बीच उठ रहा है कि आखिर ग्रिपेन की कीमत कितनी है और क्या यह राफेल से सस्ता है.

यूनिट कॉस्ट की तुलना

एक फाइटर जेट की कीमत कभी भी सिर्फ एयरक्राफ्ट के बारे में नहीं होती. इसमें हथियारों के पैकेज, स्पेयर पार्ट्स, सिमुलेटर, ट्रेनिंग, मेंटेनेंस एग्रीमेंट और कभी-कभी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी शामिल होते हैं. एक ग्रिपेन फाइटर जेट की कीमत लगभग 85 मिलियन डॉलर से 140 मिलियन डॉलर प्रति एयरक्राफ्ट है. इसी के साथ राफेल की कीमत लगभग 125 मिलियन डॉलर से 208 मिलियन डॉलर प्रति एयरक्राफ्ट है. इसका सीधा सा मतलब होता है कि ग्रिपेन की बेस एक्विजिशन कॉस्ट आमतौर पर कॉन्फिग्रेशन और कॉन्ट्रैक्ट स्ट्रक्चर के आधार पर राफेल से कम होती है.

 

 

क्या है ऑपरेटिंग लागत

इसी के साथ किसी भी फाइटर जेट का सबसे बड़ा लंबे समय का खर्च उसकी ऑपरेटिंग लागत होती है. ग्रिपेन का खर्च लगभग $4000  से $10000 हर फ्लाइट घंटे का है. वहीं राफेल का खर्च $14000 से ज्यादा हर फ्लाइट घंटे का है.

ग्रिपेन को मेंटेनेंस और ऑपरेशनल खर्च के मामले में दुनिया के सबसे किफायती फाइटर जेट में से एक के तौर पर बड़े पैमाने पर मार्केट किया जाता है.  कम फ्यूल की खपत और आसान मेंटेनेंस की जरूरतें इसे उन एयरफोर्स के लिए आकर्षक बनाती हैं जो लाइफसाइकल कॉस्ट को कंट्रोल करना चाहती हैं.

इसे किफायती क्यों माना जाता है 

ग्रिपेन को अक्सर एक हल्का मल्टी रोल फाइटर बताया जाता है. इसे फ्लैक्सिबल और किफायती होने के लिए डिजाइन किया गया है.  रिपोर्ट्स के मुताबिक Saab ने कुछ प्रपोज में भारत को यह एयरक्राफ्ट राफेल की एक्विजिशन कॉस्ट से लगभग आधी कीमत पर ऑफर किया है. इसका माड्यूलर डिजाइन आसान अपग्रेड की इजाजत देता है और यह छोटे रनवे से ऑपरेशन के लिए ऑप्टिमाइज्ड है. भारत के मामले में 114 राफेल जेट खरीदने की बातचीत की वैल्यू लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है. इस आंकड़े में एयरक्राफ्ट एडवांस्ड वेपन सिस्टम, मेंटेनेंस पैकेज और मेक इन इंडिया पहल के तहत संभावित लोकल मैन्युफैक्चरिंग शामिल है. कोई भी ग्रिपेन डील इसी तरह टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, लोकल असेंबली और स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप पर निर्भर हो सकती है. इससे फाइनल प्राइसिंग पर काफी असर डलेगा.

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