हाल ही में अमेरिका और ईरान ने ओमान में परमाणु पर बातचीत करने पर सहमति जताई है. चाहे डिप्लोमेसी हो, बैन हो, इंस्पेक्शन हो या फिर मिलिट्री प्रेशर हो यूनाइटेड स्टेट्स ने कई इलाकों में न्यूक्लियर वेपंस प्रोग्राम को प्रभावित करने या फिर खत्म करने में एक बड़ी भूमिका निभाई है. 22 जून 2025 को यूनाइटेड स्टेट्स ने कथित तौर पर ईरान की खास न्यूक्लियर फैसिलिटी पर हमले किए थे. लेकिन आपको बता दें कि ईरान अकेला मामला नहीं है. बीते कुछ सालों में कई देशों ने यूएस के असर या प्रेशर में अपनी न्यूक्लियर महत्वाकांक्षाओं को या तो रोक दिया या फिर छोड़ दिया.
ईरान के खिलाफ मिलिट्री ऑपरेशन
जून 2025 में यूनाइटेड स्टेट्स में स्थित तौर पर फोर्डो, नतांज और इस्फहान में न्यूक्लियर फैसिलिटी को टारगेट करते हुए एक मिलिट्री ऑपरेशन को शुरू किया. इस ऑपरेशन को ऑपरेशन मिडनाइट हैमर कहा गया. इसका मकसद ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाना था.
यूनाइटेड स्टेट्स के असेसमेंट के मुताबिक इन हमलों ने ईरान की एनरिचमेंट कैपेबिलिटी को काफी पीछे धकेल दिया. यह कदम ईरान के न्यूक्लियर इरादों को लेकर सालों तक चले बैन, बातचीत और तनाव के बाद उठाया.
लीबिया पर भी दबाव
2003 में मुअम्मर गद्दाफी के लीडरशिप में लीबिया अपनी मर्जी से ही अपने वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन प्रोग्राम को खत्म करने के लिए राजी हो गया. इसमें उसका न्यूक्लियर प्रयास भी शामिल था. यूनाइटेड स्टेट्स और यूनाइटेड किंगडम के साथ लंबे डिप्लोमेटिक जुड़ाव के बाद लीबिया ने इंटरनेशनल इंस्पेक्टर को इसे खत्म करने की प्रक्रिया की देखरेख करने की इजाजत दी. इस मामले को अक्सर एक ऐसे देश के उदाहरण के तौर पर बताया गया जो मिलट्री एक्शन के बजाय बातचीत के जरिए न्यूक्लियर इरादे छोड़ रहा हो.

साउथ अफ्रीका
कोल्ड वॉर के आखिर में साउथ अफ्रीका ने 6 न्यूक्लियर हथियारों को खत्म करने का ऐसा बड़ा फैसला लिया जो पहले कभी नहीं हुआ था. इन हथियारों को उसने चुपके से बनाया था. हालांकि यह फैसला अंदरूनी तौर पर लिया गया था लेकिन डिप्लोमेटिक दबाव और बदलते ग्लोबल हालात ने इसमें एक बड़ी भूमिका निभाई थी. आपको बता दें कि इस में यूएस की भी एक बड़ी भूमिका थी. साउथ अफ्रीका ने बाद में न्यूक्लियर नॉन प्रोलिफरेशन ट्रीटी पर साइन किया और अपनी मर्जी से अपने न्यूक्लियर हथियारों का जखीरा बनाने और फिर उसे खत्म करने वाला अकेला देश बन गया.
यूक्रेन, कजाकिस्तान और बेलारूस
सोवियत यूनियन के टूटने के बाद तीन नए आजाद हुए देश यूक्रेन, कजाकिस्तान और बेलारूस के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा न्यूक्लियर हथियार था. यूनाइटेड स्टेट्स और रूस की अगुवाई में डिप्लोमेटिक बातचीत के जरिए यह देश बुडापेस्ट मेमोरेंडम के तहत अपने न्यूक्लियर हथियार रूस को ट्रांसफर करने और नॉन न्यूक्लियर देश के तौर पर एनपीटी में शामिल होने पर राजी हो गया.
इराक
1991 के गल्फ वॉर के बाद यूनाइटेड स्टेट्स में सद्दाम हुसैन के तहत इराक के संदिग्ध हथियार प्रोग्राम को खत्म करने के मकसद से इंटरनेशनल प्रतिबंध और हथियारों की जांच की. कई सालों तक यूनाइटेड नेशन की जांच और बैन ने इराक की न्यूक्लियर क्षमताओं को काफी कम कर दिया. 2003 में यूनाइटेड स्टेट्स के नेतृत्व में हुए हमले को बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियारों के आरोपों से कुछ हद तक सही ठहराया गया. लेकिन बाद में कोई भी एक्टिव न्यूक्लियर हथियार प्रोग्राम नहीं मिला.
न्यूक्लियर हथियारों को रोकने के लिए यूएस की स्ट्रेटजी
समय के साथ यूनाइटेड स्टेट्स ने न्यूक्लियर हथियारों के फैलाव को रोकने के लिए डिप्लोमेटिक फ्रेमवर्क और स्ट्रैटेजिक टूल्स के कॉन्बिनेशन पर भरोसा किया. इसमें न्यूक्लियर नॉन प्रोलिफरेशन ट्रीटी और आर्म्स कंट्रोल एग्रीमेंट शामिल हैं. हालांकि डिप्लोमेसी और प्रबंध अक्सर पसंदीदा टूल्स रहे हैं. लेकिन जब यूनाइटेड स्टेट्स को लगा कि बातचीत फेल हो रही है या फिर खतरा आने वाला है तो सीधी मिलिट्री कार्रवाई का भी सहारा लिया गया.
