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पृथ्वी की कितनी गहराई तक जा सका है इंसान, धरती के आर-पार क्यों नहीं कर पाया छेद?

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हम रोज जिस धरती पर चलते हैं, उसकी सतह के नीचे क्या छिपा है यह सवाल इंसान को सदियों से परेशान करता रहा है. क्या आपने कभी सोचा है कि अगर हम सीधे नीचे की ओर खुदाई करते जाएं, तो आखिर कहां तक पहुंच पाएंगे? क्या धरती के आर-पार छेद करना मुमकिन है, या फिर यह सिर्फ कल्पना है? हैरानी की बात यह है कि इंसान ने अंतरिक्ष में तो कदम रख दिया, लेकिन धरती के अंदर झांकना आज भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है.

धरती की परतें

पृथ्वी को पूरी तरह समझने के लिए वैज्ञानिकों ने इसे पांच अलग-अलग परतों में बांटा है. सबसे ऊपर की परत को क्रस्ट कहा जाता है. यही वह हिस्सा है जहां इंसान रहता है, खेती करता है और शहर बसाता है. इसकी मोटाई औसतन करीब 64 किलोमीटर है, यानी यह पृथ्वी की सबसे पतली परत है.

क्रस्ट के नीचे आती है अपर मेंटल, जो लगभग 350 किलोमीटर तक फैली हुई है. यहां तापमान काफी अधिक होता है और चट्टानें बेहद गर्म रहती हैं. ज्वालामुखियों से निकलने वाला लावा इसी परत से आता है.

इसके बाद लॉअर मेंटल शुरू होता है, जो करीब 660 किलोमीटर से लेकर 2,900 किलोमीटर तक फैला है. यह हिस्सा अत्यधिक दबाव और तापमान वाला होता है, जहां चट्टानें ठोस होते हुए भी धीरे-धीरे बहने जैसी स्थिति में रहती हैं.

 

 

धरती का सबसे खतरनाक हिस्सा

मेंटल के नीचे आता है आउटर कोर, जो पिघले हुए लोहे और निकल से बना है. इसकी मोटाई करीब 2,200 किलोमीटर है. यही परत पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को जन्म देती है, जो हमें सूर्य की खतरनाक किरणों से बचाता है.

सबसे अंदर स्थित है इनर कोर, जो करीब 1,200 किलोमीटर मोटा ठोस गोला है. यहां का तापमान सूरज की सतह के बराबर, यानी करीब 5,500 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है. पृथ्वी की सतह से इसके केंद्र तक की कुल दूरी लगभग 6,371 किलोमीटर है.

इंसान कितनी गहराई तक पहुंच पाया है?

इतनी गहराई सुनकर लगता है कि शायद इंसान वहां तक पहुंच ही नहीं पाया होगा और यह सच भी है. इंसान अब तक सबसे गहरी खुदाई सिर्फ 12.2 किलोमीटर तक ही कर सका है. यह खुदाई रूस में किए गए कोला सुपरडीप बोरहोल के नाम से जानी जाती है. यह दूरी पृथ्वी की कुल गहराई का एक प्रतिशत भी नहीं है.

धरती के आर-पार छेद क्यों नहीं हो सका?

धरती के आर-पार छेद न कर पाने की सबसे बड़ी वजह है असहनीय तापमान. जैसे-जैसे गहराई बढ़ती है, तापमान इतना बढ़ जाता है कि स्टील और आधुनिक ड्रिलिंग मशीनें भी पिघलने लगती हैं. 12 किलोमीटर के बाद ही हालात बेहद खतरनाक हो जाते हैं.

दूसरा कारण है बेहद ज्यादा दबाव. नीचे जाते ही चट्टानों का दबाव इतना बढ़ जाता है कि कोई भी मानव-निर्मित उपकरण टिक नहीं पाता. इसके अलावा, गहराई में मौजूद तरल मैग्मा और गैसें किसी भी खोदे गए छेद को तुरंत भर देती हैं.

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