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लोहड़ी-संक्रांति से लेकर पोंगल तक… हर राज्य में अलग-अलग क्यों हैं फसलों से जुड़े त्योहार के नाम?

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भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है. यहां हर मौसम, हर बदलाव और हर प्राकृतिक घटना को किसी न किसी उत्सव से जोड़ दिया गया है. जनवरी का महीना भी ऐसा ही खास समय होता है, जब सर्दी धीरे-धीरे विदा लेने लगती है और खेतों में लहलहाती फसल किसानों की मेहनत का फल दिखाने लगती है. इसी समय पूरे देश में एक बड़ा पर्व मनाया जाता है, जिसे हम मकर संक्रांति के नाम से जानते हैं. मकर संक्रांति सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, सूर्य और खेती से जुड़े जीवन का उत्सव है.

यही वजह है कि इसे पूरे भारत में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में इस पर्व का नाम, रूप और परंपराएं अलग-अलग हैं. कहीं यह खिचड़ी है, कहीं लोहड़ी, कहीं पोंगल तो कहीं बिहू. सवाल यह उठता है कि जब पर्व एक ही है, तो इसके नाम और तरीके इतने अलग क्यों हैं. तो आइए जानते हैं कि लोहड़ी-संक्रांति से लेकर पोंगल तक हर राज्य में फसलों से जुड़े त्योहार के नाम अलग-अलग क्यों हैं.

हर राज्य में फसलों से जुड़े त्योहार के नाम अलग-अलग क्यों हैं

हमारे देश में जलवायु, फसलें, बोली-भाषा, खान-पान और परंपराएं हर कुछ सौ किलोमीटर पर बदल जाती हैं. खेती का तरीका और फसल कटाई का समय भी हर क्षेत्र में अलग होता है. इसलिए, एक ही पर्व हर राज्य में स्थानीय संस्कृति के अनुसार नया नाम और नया रंग ले लेता है. हर राज्य में फसलों से जुड़े त्योहारों के नाम अलग-अलग होने का कारण भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक और कृषि संबंधी विविधता है. भारत के हर हिस्से में मौसम एक जैसा नहीं होता, कहीं सर्दी ज्यादा होती है, कहीं गर्मी और कहीं बारिश. इसी वजह से फसल पकने और कटाई का समय भी अलग होता है.

जब फसल तैयार होती है, तब लोग खुशी मनाते हैं और उसी समय से जुड़ा त्योहार बन जाता है. कहीं धान उगाया जाता है, कहीं गेहूं, कहीं गन्ना तो कहीं मक्का, अलग-अलग फसलों की वजह से त्योहारों में बनने वाले पकवान और रस्में भी बदल जाती हैं, और नाम भी स्थानीय फसल के अनुसार रखे जाते हैं. भारत में हर राज्य की अपनी भाषा और संस्कृति है.एक ही त्योहार को लोग अपनी भाषा में अलग नाम देते हैं जैसे मकर संक्रांति कहीं पोंगल है, कहीं बिहू, कहीं लोहड़ी और कहीं खिचड़ी.

 

 

उत्तर भारत खिचड़ी और दान का पर्व

उत्तर प्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति को आमतौर पर खिचड़ी कहा जाता है. इस दिन गंगा स्नान और दान का विशेष महत्व होता है.लोग सुबह-सुबह नदियों में स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देते हैं और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करते हैं. प्रयागराज में इस अवसर पर माघ मेला लगता है, जहां लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं. खाने में उड़द की दाल और चावल की खिचड़ी, तिल के लड्डू और गुड़ का खास महत्व है. बिहार में दही-चूड़ा खाने की परंपरा भी इसी दिन से जुड़ी है.

पश्चिम भारत पतंग, मिठास और मेलजोल

गुजरात में मकर संक्रांति को उत्तरायण कहा जाता है. यहां यह पर्व पतंग महोत्सव के रूप में मनाया जाता है. आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है और हर उम्र के लोग इस उत्सव में शामिल होते हैं. खाने में उंधियू और चिक्की जैसी पारंपरिक चीजें बनाई जाती हैं. राजस्थान में भी पतंगबाजी होती है, लेकिन साथ ही पारिवारिक परंपराओं का भी खास ध्यान रखा जाता है. महाराष्ट्र और राजस्थान के कई हिस्सों में इसे संक्रांत या सक्रात कहा जाता है.यहां लोग तिल-गुड़ बांटते हैं.

पंजाब और हरियाणा आग और उत्साह का पर्व

पंजाब में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी मनाई जाती है. लोग अलाव जलाते हैं, उसके चारों ओर घूमते हैं और मूंगफली, रेवड़ी व फुल्ले अर्पित करते हैं. यह सर्दी के अंत और नई फसल के स्वागत का प्रतीक है. अगले दिन माघी मनाई जाती है, जिसमें स्नान और दान की परंपरा होती है.

दक्षिण भारत पोंगल का चार दिन का उत्सव

तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल कहा जाता है और इसे चार दिनों तक मनाया जाता है. जिसमें पहला दिन भोगी पोंगल  है. पुराने सामान को जलाकर नई शुरुआत की जाती है. वहीं दूसरा दिन थाई पोंगल, सूर्य देव को दूध और नए चावल से बनी पोंगल अर्पित की जाती है. इसके बाद मट्टू पोंगल, खेती में मदद करने वाले पशुओं की पूजा होती है और चौथा दिन कानुम पोंगल परिवार और रिश्तेदार मिलकर उत्सव मनाते हैं. कर्नाटक में इसे सुग्गी कहा जाता है. यहां लोग एक-दूसरे को एल्लु-बेल्ल (तिल, गुड़ और नारियल) बांटते हैं.

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