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Why Virus Outbreak In Keralam: कोरोना से निपाह तक… खतरनाक वायरस के मामले पहले केरल में ही क्यों सामने आते हैं? जानें वजह…

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Why Virus Outbreak In Keralam: भारत में जब भी किसी नए और घातक वायरस की दस्तक होती है, तो अक्सर उसका पहला मामला केरल राज्य से ही सामने आता है. कोरोना महामारी से लेकर निपाह, मंकीपॉक्स और शिगेला जैसे संक्रमणों की शुरुआत सबसे पहले केरल में ही देखने को मिली है. हाल ही में राज्य में निपाह वायरस का प्रकोप एक बार फिर दिखा है और इसके साथ ही शिगेला इंफेक्शन के कारण एक बच्चे की जान भी चली गई है. एक ही समय पर दो अलग-अलग खतरनाक संक्रमणों का सक्रिय होना वाकई चिंता का विषय है. इस स्थिति को देखकर हर किसी के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर केरल ही बार-बार इन संक्रामक बीमारियों का एंट्री पॉइंट क्यों बनता है. इसके पीछे वहां की भौगोलिक स्थिति, आबादी का ढांचा और स्वास्थ्य प्रणाली से जुड़े कई महत्वपूर्ण कारण जिम्मेदार हैं, जिन्हें गहराई से समझना बेहद जरूरी है.

जंगलों की कटाई और वन्यजीवों से सीधा संपर्क

केरल का एक बड़ा हिस्सा पश्चिमी घाट के घने जंगलों से घिरा हुआ है, जो प्राकृतिक रूप से फ्रूट बैट्स यानी फल खाने वाले चमगादड़ों का मुख्य घर माना जाता है. पिछले कुछ सालों में राज्य में विकास और शहरीकरण की रफ्तार बहुत तेजी से बढ़ी है, जिसकी वजह से जंगलों को काटा जा रहा है. जब इन चमगादड़ों के रहने के प्राकृतिक ठिकाने नष्ट होने लगे, तो उन्होंने इंसानी बस्तियों के आस-पास अपना डेरा जमाना शुरू कर दिया. इस बदलाव के कारण अब इंसानों और जंगली जीवों के बीच की दूरी बहुत कम हो गई है. यही वजह है कि जानवरों में रहने वाले वायरस बहुत आसानी से इंसानी आबादी के बीच पहुंचकर उन्हें अपनी चपेट में ले रहे हैं.

ताड़ी और दूषित फलों का सेवन बना बड़ी मुसीबत

केरल के ग्रामीण इलाकों में पेड़ों से निकलने वाली ताड़ी और ताजे फलों का सेवन करने का चलन बहुत ज्यादा है. जंगलों के करीब होने के कारण चमगादड़ अक्सर इन फलों या ताड़ी के बर्तनों पर बैठ जाते हैं और अपनी लार या मल-मूत्र से उन्हें दूषित कर देते हैं. जब स्थानीय लोग अनजाने में ऐसे संक्रमित फलों या ताड़ी का इस्तेमाल करते हैं, तो निपाह जैसा जानलेवा वायरस सीधे उनके शरीर में प्रवेश कर जाता है. इस तरह का सीधा संपर्क इंसानों में जूनोटिक यानी जानवरों से फैलने वाली बीमारियों के फैलने का एक बहुत बड़ा और मुख्य जरिया बन चुका है.

 

 

घनी आबादी के कारण संक्रमण फैलने की तेज रफ्तार

केरल भारत के उन राज्यों में शामिल है जहां का जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है. इसका सीधा मतलब यह है कि यहां बहुत ही कम दायरे में बहुत ज्यादा लोग मिलकर रहते हैं. घनी आबादी होने का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि जब भी कोई नया संक्रामक वायरस किसी एक व्यक्ति को अपना शिकार बनाता है, तो वह बहुत ही कम समय में दूसरों तक पहुंच जाता है. सामाजिक और पारिवारिक रूप से बेहद जुड़े होने के कारण भी यहां एक मरीज की देखभाल करने वाले घर के लोगों या डॉक्टरों में वायरस का प्रसार बहुत तेजी से देखने को मिलता है.

दुनिया भर में फैला खाड़ी देशों का मजबूत नेटवर्क

केरल का आर्थिक और सामाजिक ताना-बाना विदेशों से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है. राज्य की एक बहुत बड़ी आबादी, जो करीब 25,00,000 से भी ज्यादा है, रोजगार के सिलसिले में खाड़ी देशों में रहती है. इसके अलावा लाखों अन्य लोग अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे इलाकों में काम करते हैं. इन लोगों का अपने घर लगातार आना-जाना लगा रहता है, जिसके कारण प्रति व्यक्ति के हिसाब से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से आने वाले यात्रियों की संख्या केरल में बहुत ज्यादा है. यह ग्लोबल कनेक्टिविटी जहां राज्य को आर्थिक मजबूती देती है, वहीं वैश्विक स्तर पर फैलने वाले संक्रमणों के लिए एक आसान रास्ता भी खोल देती है.

कोरोना महामारी की पहली दस्तक का इतिहास

वैश्विक यात्रा के इसी नेटवर्क का नतीजा था कि भारत में सदी की सबसे बड़ी महामारी कोरोना का पहला मामला भी केरल में ही दर्ज किया गया था. साल 2020 की 27 जनवरी को चीन की वुहान यूनिवर्सिटी से पढ़कर लौटी एक 20 साल की छात्रा में इस वायरस की पुष्टि हुई थी, जो केरल के त्रिशूर के एक अस्पताल में भर्ती थी. इस घटना से साफ हो जाता है कि दुनिया के किसी भी कोने में फैलने वाला नया वायरस अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के जरिए सबसे पहले केरल की धरती पर ही कदम रखता है.

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