Underground River: सदियों से सरस्वती नदी का भारत के इतिहास, पौराणिक कथाओं और वैज्ञानिक शोध में एक खास स्थान रहा है. प्राचीन वैदिक ग्रंथों में इसका बड़े पैमाने पर जिक्र मिलता है. ऐसा माना जाता है कि यह नदी कभी उत्तर पश्चिमी भारत में बहती थी और फिर धीरे-धीरे जमीन की सतह से गायब हो गई. आज कई शोधकर्ताओं का मानना है कि सरस्वती एक भूमिगत नदी प्रणाली के रूप में मौजूद है.
भारत की रहस्यमयी भूमिगत नदी
सरस्वती को अक्सर भारत की खोई हुई नदी कहा जाता है. हालांकि अब यह सतह पर एक बड़ी और दिखाई देने वाली नदी के रूप में मौजूद नहीं है लेकिन कई वैज्ञानिक अध्ययनों में उत्तरी और पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों के नीचे प्राचीन दबे हुए नदी के रास्ते पाए गए हैं. शोधकर्ताओं का ऐसा मानना है कि हजारों साल पहले भूवैज्ञानिक बदलाव, नदी प्रणालियों में बदलाव और जलवायु संबंधी कारणों से इस नदी का रास्ता धीरे-धीरे बदल गया.
त्रिवेणी संगम पर दिखाई ना देने वाली नदी
सरस्वती से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध जगह में से एक है प्रयागराज का त्रिवेणी संगम. यहां गंगा और यमुना नदियों का पानी दिखाई देता है जबकि पारंपरिक रूप से माना जाता है कि सरस्वती जमीन के नीचे से अदृश्य रूप में उनसे मिलती है. आधुनिक सैटेलाइट मैपिंग और भूवैज्ञानिक अध्ययनों से इस इलाके के नीचे एक प्राचीन दबी हुई नदी का रास्ता पता चला है.

सरस्वती का दिखाई देने वाला स्थल
बद्रीनाथ के पास माना गांव के नजदीक लोग एक नदी देख सकते हैं जिसे स्थानीय लोग सरस्वती कहते हैं. यह नदी हिमालय की पहाड़ियों से निकलती है और जोरदार बहाव के साथ बहती है. इसके बाद मशहूर भीम पुल के पास जमीन के नीचे गायब हो जाती है.
हरियाणा और पंजाब में संरक्षित प्राचीन नदी तल
भू वैज्ञानिकों ने हरियाणा और पंजाब के मैदानी इलाकों में कई प्राचीन नदी के रास्ते खोजे हैं. कई शोधकर्ता घग्गर नदी को प्राचीन सरस्वती प्रणाली का सबसे करीबी बचा हुआ अवशेष मानते हैं. कुरुक्षेत्र और उसके आसपास किए गए अध्ययनों से जमीन के नीचे दबे हुए नदी तलों के सबूत मिले हैं.
राजस्थान में जमीन के नीचे पानी के भंडार
थार रेगिस्तान के इलाके से उस खोई हुई नदी के बारे में काफी कुछ पता चलता है. जैसलमेर और थार रेगिस्तान के आसपास के इलाकों में वैज्ञानिकों को जमीन के नीचे मीठे पानी के काफी बड़े भंडार मिले हैं. सैटेलाइट तस्वीरों से रेगिस्तान की रेत के नीचे एक काफी बड़ी सूखी हुई नदी के रास्ते का पता चला है. काफी रिसर्चर इन खोजों को प्राचीन सरस्वती नदी से जोड़कर देख रहे हैं.
