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हर शहर से क्यों नहीं उड़ते विमान, जानें देश में कौन-किस आधार पर लेता है एयरपोर्ट बनाने का फैसला?

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आज के दौर में हर कोई चाहता है कि उसके शहर में एक चमचमाता एयरपोर्ट हो ताकि मिनटों में लंबी दूरियां तय की जा सकें. भारत में हवाई सफर करने वालों की तादाद रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ रही है और छोटे-छोटे शहरों को भी आसमान से जोड़ने की कवायद जारी है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि चाहकर भी हर जिले या शहर में हवाई अड्डा क्यों नहीं बनाया जा सकता? आखिर वो कौन सी बड़ी वजहें और सरकारी नियम हैं जो तय करते हैं कि विमान कहां से उड़ान भरेंगे और कहां नहीं? आइए जानते हैं भारत में एयरपोर्ट बनाने के फैसले के पीछे का पूरा सच.

तेजी से बदलती हवाई कनेक्टिविटी की तस्वीर

पिछले 10 सालों में भारत के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में एक अभूतपूर्व क्रांति देखने को मिली है. साल 2014 तक देश के भीतर सिर्फ 74 चालू हवाई अड्डे मौजूद थे, लेकिन आज यह आंकड़ा छलांग लगाकर 160 के पार पहुंच चुका है. देश में जहां एक तरफ नवी मुंबई एयरपोर्ट और जेवर एयरपोर्ट जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स से पहली उड़ान की जोरदार तैयारियां चल रही हैं, वहीं सरकार अब उन छोटे और दूर-दराज के इलाकों पर भी फोकस कर रही है जहां भविष्य में बिजनेस और पर्यटन बढ़ने की भारी संभावनाएं हैं.

एयरपोर्ट बनाने का पहला और मुख्य पैमाना

किसी भी शहर में नया हवाई अड्डा मंजूर करने से पहले केंद्र सरकार और एविएशन एजेंसियां वहां के ‘एयर ट्रैफिक’ की जरूरत का बारीकी से अध्ययन करती हैं. इसके तहत उस विशेष इलाके की कुल आबादी, वहां होने वाली कारोबारी गतिविधियां, पर्यटन के केंद्र, माल ढुलाई यानी कार्गो मूवमेंट और लोगों के आने-जाने के मौजूदा तरीकों को परखा जाता है. जिस जगह पर भविष्य में यात्रियों की संख्या बढ़ने की सबसे ज्यादा उम्मीद होती है, उसे ही लिस्ट में प्राथमिकता दी जाती है.

 

 

मौजूदा हवाई अड्डों पर यात्रियों का भारी दबाव

कई बार नए एयरपोर्ट का निर्माण इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि पुराने हवाई अड्डों पर यात्रियों को संभालने की क्षमता खत्म होने लगती है. दिल्ली-NCR में जेवर एयरपोर्ट और मुंबई में नवी मुंबई एयरपोर्ट को हरी झंडी इसीलिए मिली क्योंकि वहां के मौजूदा हवाई अड्डों पर उड़ानों का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया था. ठीक इसी तरह की स्थिति अब बेंगलुरु में भी पैदा हो रही है, जिसके चलते वहां भी एक दूसरे इंटरनेशनल एयरपोर्ट को बनाने की शुरुआती तैयारियां तेजी से शुरू कर दी गई हैं.

150 किलोमीटर का बेहद खास हवाई नियम

भारत सरकार की ‘ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट पॉलिसी’ के तहत एक बेहद कड़ा नियम बनाया गया है, जिसके मुताबिक किसी भी चालू हवाई अड्डे के 150 किलोमीटर के दायरे में दूसरा नया एयरपोर्ट नहीं बनाया जा सकता. इस नियम के पीछे की मुख्य वजह एक ही क्षेत्र में बिना वजह बहुत ज्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा होने से रोकना और पुराने एयरपोर्ट को आर्थिक घाटे से बचाना है. हालांकि, जेवर और नवी मुंबई जैसे मामलों में क्षमता पूरी होने के कारण सरकार ने इस दूरी के नियम में विशेष छूट दी है.

जमीन अधिग्रहण सबसे बड़ी चुनौती

एक आधुनिक और बड़े हवाई अड्डे को तैयार करने के लिए सरकार को हजारों एकड़ समतल जमीन की जरूरत होती है. यही वजह है कि एयरपोर्ट प्रोजेक्ट्स में सबसे मुश्किल काम जमीन का अधिग्रहण करना माना जाता है. कई बार किसानों का विरोध, मुआवजे को लेकर चलने वाले लंबे कानूनी विवाद, पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियां और भौगोलिक अड़चनें किसी भी अच्छे प्रोजेक्ट की रफ्तार को सालों साल के लिए ठंडे बस्ते में डाल देती हैं, जिससे कई शहरों का सपना अधूरा रह जाता है.

कैसे काम करती है मंजूरी की सरकारी चेन?

हवाई अड्डा बनाने का अंतिम फैसला केवल केंद्र सरकार अकेले नहीं ले सकती. इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत राज्य सरकार की तरफ से होती है, जो पहले जमीन की पहचान करती है और फिर शुरुआती फिजिबिलिटी स्टडी करवाकर इसका पूरा प्रस्ताव नागरिक उड्डयन मंत्रालय को भेजती है. इसके बाद मंत्रालय की स्टीयरिंग कमेटी, एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) और रक्षा मंत्रालय मिलकर इसकी सुरक्षा और तकनीकी जांच करते हैं. डीजीसीए (DGCA) से अंतिम लाइसेंस मिलने के बाद ही विमान उड़ान भर पाते हैं.

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