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वानी-मूसा की विरासत की चाह और IED रिसर्च, उमर नबी को लेकर चौंकाने वाला खुलासा…

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रेड फोर्ट कार बम विस्फोट मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, कई चौंकाने वाली बातें सामने आ रही हैं. इस पूरी साजिश के केंद्र में मौजूद उमर नबी न सिर्फ अपने साथियों से विचारधारा और फंडिंग के मुद्दे पर अलग सोच रखता था, बल्कि खुद को कश्मीर के चर्चित उग्रवादियों बुरहान वानी और जाकिर मूसा की विरासत का उत्तराधिकारी भी मानता था.

जांच एजेंसियों के मुताबिक, उमर 2023 से ही IEDs यानी विस्फोटक उपकरणों पर रिसर्च कर रहा था और आईईडी बनाना उसकी खास विशेषज्ञता बन चुका था. जांच में पता चला है कि जैश-ए-मोहम्मद (JeM) से जुड़े इस टेरर मॉड्यूल में विचारधारा को लेकर गहरी फूट थी. उमर नबी ISIS (दाएश) के मॉडल को फॉलो करता था, जबकि बाकी सदस्य मुजम्मिल गनई, अदील राठर और मौलवी मुफ़्ती इरफान अल-कायदा की सोच के करीब थे.

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अल-कायदा दूर बैठे दुश्मनों और पश्चिमी संस्कृति पर हमला करने की बात करता है. मगर ISIS का मकसद एक खिलाफत खड़ी करना और अपने नजदीकी दुश्मन को निशाना बनाना है. यही सोच उमर को ज्यादा पसंद थी. यह भी सामने आया कि इन तीनों सदस्यों ने कभी अफगानिस्तान जाकर ट्रेनिंग लेने की कोशिश भी की थी, लेकिन नाकाम रहे. इसके बाद उन्होंने ‘घर के आसपास’ ही टारगेट ढूँढने की योजना बनाई.

उमर नबी के अंदर विरासत साबित करने का जुनून था. वह समझता था कि कश्मीर में बुरहान वानी और जाकिर मूसा की उग्रवादी लाइन को आगे बढ़ाने वाला वही है. उमर लगातार खुद को इन दोनों की जगह पर देखता था. उसका मकसद बड़ा हमला कर खुद को अगला नाम बनाना था. इसी जुनून के चलते उसने 2023 के बाद से IEDs पर गहराई से काम करना शुरू कर दिया था और कई तरह के रसायनों पर प्रयोग किए.

फंडिंग को लेकर हुआ विवाद

रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादातर पैसा शहीन शाहिद अंसारी ने दिया था, जो अल-फलाह यूनिवर्सिटी में गनई का साथी है और गिरफ्तार आरोपियों में शामिल है. लेकिन उमर फंड के इस्तेमाल में न तो पारदर्शी था, न ही वह खर्च का ठीक-ठाक हिसाब देता था. वह अपने स्तर पर फैसले लेता रहा, जिससे बाकी सदस्य उससे नाराज हो गए.

मतभेद इतने बढ़े कि अक्टूबर की शुरुआत में जब राठर की शादी हुई, उमर नबी उसमें गया ही नहीं. लेकिन हालात तब बदल गए जब घाटी में मौलवी मुफ़्ती इरफान वागाय को गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद उमर को लगा कि समूह टूट सकता है.

इसलिए वह 18 अक्टूबर को कश्मीर के काज़ीगुंड पहुंचा ताकि बाकियों से रिश्ते सुधार सके और खुद को फिर से लीडरशिप पोजीशन में रख सके. जानकारी के मुताबिक काजीगुंड की इस बैठक में उसने समूह को दोबारा अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश की और तीन हफ्ते बाद दिल्ली में धमाका हो गया.

 

 

ग्रुप खुद को कहता था ‘इंटरिम अंसार गजवतुल हिंद’

जांच में यह भी सामने आया कि यह मॉड्यूल खुद को ‘इंटरिम अंसार गजवतुल हिंद’ कहता था. इंटरिम अंसार गजवतुल हिंद को सुरक्षा एजेंसियां अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट का हिस्सा मानती हैं.

राठर को इन लोगों ने प्रमुख घोषित किया था.  यह मॉड्यूल इंटर-स्टेट और इंटरनेशनल टेरर नेटवर्क का हिस्सा था.  दिल्ली पुलिस और J-K पुलिस की शुरुआती जांच में इसकी पुष्टि भी हो चुकी है. 9 नवंबर को J-K पुलिस की प्रेस रिलीज में भी इन तीनों वागाय, गनई और राठर के नाम दर्ज थे.

2,900 किलो IED सामग्री बरामद

मुफ्ती इरफान की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को इस मॉड्यूल के बाकी सदस्यों का पता चला. जांच में फरीदाबाद से 2,900 किलो IED बनाने की सामग्री बरामद हुई. इसमें शामिल था, विस्फोटक पदार्थ, केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट, तार, बैटरियाँ, टाइमर, रिमोट, धातु की प्लेटें, ज्वलनशील सामान, उमर और गनई दोनों के पास उस कमरे की चाबी थी जहाँ यह सब रखा गया था. उमर ने कई तरह के केमिकल पर खुद प्रयोग किए थे.

इस मॉड्यूल से बरामद सभी विस्फोटक और सामग्री नौगाम पुलिस स्टेशन में रखी गई थी. लेकिन दिल्ली विस्फोट के चार दिन बाद सैंपलिंग के दौरान एक ‘दुर्घटनावश धमाका’ हो गया. जिसमें 9 लोगों की मौत और 27 लोग घायल हो गए थे. पुलिस स्टेशन को भारी नुकसान हुआ था. जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस हादसे की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए थे. इस जांच की निगरानी UT के प्रिंसिपल सेक्रेटरी (गृह) और IG, कश्मीर जोन कर रहे हैं.

जांच कई स्तरों पर आगे बढ़ रही है लेकिन साफ दिख रहा है कि आंतरिक टकराव और अलग एजेंडा से यह मॉड्यूल अंदर से ही टूटा हुआ था. विचारधारा अलग, फंडिंग पर विवाद, हमला करने के तरीके को लेकर झगड़ा और हर किसी का अपना एजेंडा, उमर नबी की लीडरशिप की चाह और खुद को वानी-मूसा की लाइन में खड़ा करने की महत्वाकांक्षा ने इस पूरे मॉड्यूल को फेल कर दिया.

 

 

 

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