रेत के समंदर में बसा एक देश, जिसकी जमीन के नीचे छिपी दौलत ने उसकी तकदीर पलट दी. कभी मछली पकड़ने और छोटे व्यापार तक सीमित यह इलाका आज दुनिया की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा सहारा बन चुका है. यहां जमीन खोदो तो इतिहास नहीं, बल्कि काला सोना निकलता है. सवाल यही है कि आखिर कौन सा देश है, जिसे ‘काले सोने की धरती’ कहा जाता है और कैसे तेल ने इसे अमीरी की ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया? आइए समझें.
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कुवैत को दुनिया भर में ‘काले सोने की धरती’ कहा जाता है. इसका सबसे बड़ा कारण यहां मौजूद विशाल पेट्रोलियम भंडार हैं. पश्चिम एशिया में फारस की खाड़ी के उत्तर-पश्चिम में स्थित कुवैत आकार में भले ही छोटा हो, लेकिन तेल के मामले में इसकी पहचान बहुत बड़ी है.
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इसकी सीमाएं इराक और सऊदी अरब से लगती हैं, और यही भौगोलिक स्थिति इसे ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद अहम बनाती है. तेल की खोज से पहले कुवैत एक साधारण तटीय इलाका था. यहां के लोग मुख्य रूप से मछली पकड़ने, मोती निकालने और छोटे व्यापार पर निर्भर थे.
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आमदनी सीमित थी और बुनियादी सुविधाएं भी ज्यादा विकसित नहीं थीं. उस दौर में किसी ने नहीं सोचा था कि यही देश आगे चलकर दुनिया के अमीर देशों में गिना जाएगा. 20वीं सदी में जब कुवैत की धरती के नीचे विशाल तेल भंडार मिले, तब देश की तस्वीर ही बदल गई.
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पेट्रोलियम एक ऐसा प्राकृतिक संसाधन है, जो जमीन के नीचे लाखों साल पुराने जीवों के अवशेषों से बनता है. इसी कच्चे तेल को शुद्ध करके पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, विमान ईंधन और प्लास्टिक जैसे कई जरूरी उत्पाद तैयार किए जाते हैं. तेल ने कुवैत को आर्थिक रूप से मजबूत बना दिया है.
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कुवैत का बुर्गान तेल क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े तेल क्षेत्रों में गिना जाता है. यहां से हर दिन लाखों बैरल कच्चा तेल निकाला जाता है. यह क्षेत्र कुवैत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है. आने वाले कई सालों तक यहां तेल उत्पादन जारी रहने की संभावना है, जिससे देश की आय स्थिर बनी रहती है.
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कुवैत की ज्यादातर आमदनी तेल निर्यात से होती है. आधुनिक बंदरगाहों और तेल टर्मिनलों के जरिए कुवैत एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के कई देशों को तेल सप्लाई करता है. इसी कमाई से देश में स्कूल, अस्पताल, सड़कें और सामाजिक कल्याण की कई योजनाएं चलाई जाती हैं. नागरिकों को स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं बड़े स्तर पर उपलब्ध हैं.
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कुवैत तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC का अहम सदस्य है. OPEC दुनिया में तेल के उत्पादन और कीमतों पर असर डालता है. इस संगठन का हिस्सा होने से कुवैत की वैश्विक ऊर्जा बाजार में मजबूत पकड़ बनी रहती है.
