गर्मियों की शुरुआत होते ही बाजारों में अपनी खास लाली और अनोखी मिठास से सबको दीवाना बनाने वाली ‘शाही लीची’ आज बिहार की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है. मुजफ्फरपुर की इस रसीली लीची का स्वाद देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी खूब पसंद किया जाता है. लेकिन इस फल को लेकर एक ऐसा सच भी है, जिसे जानकर आप पूरी तरह हैरान रह जाएंगे. जिस शाही लीची को हम अपने देश का गौरव और पहचान मानते हैं, वह मूल रूप से भारत का फल है ही नहीं. बिहार के लोगों के जीवन में मिठास घोलने वाली इस लीची ने सात समंदर पार से भारत तक का एक बेहद लंबा और दिलचस्प सफर तय किया है.
चीन के शाही महलों से लीची की शुरुआत
लीची का इतिहास करीब 2,000 साल पुराना माना जाता है, जिसकी शुरुआत दक्षिण चीन के गुआंगडॉन्ग और फुजियान राज्यों से हुई थी. साल 1059 में यह फल पहली बार जंगली पौधों से निकलकर इंसानी बागों तक पहुंचा था. चीनी मान्यताओं के मुताबिक तांग वंश के राजा जुआंग जोंग को लीची इतनी ज्यादा पसंद थी कि इसे दक्षिण चीन से विशेष घोड़ों पर लादकर उनके महल तक लाया जाता था. चीन की संस्कृति में लीची को हमेशा से प्रेम और सौभाग्य का प्रतीक माना गया है, और यही वजह थी कि करीब 700 साल तक इस खास फल को चीन की सीमाओं से बाहर जाने ही नहीं दिया गया.
फ्रांसीसी यात्री ने खोला राज
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि 18वीं शताब्दी की शुरुआत में एक फ्रांसीसी यात्री पियरे सोन्नरे ने दक्षिण चीन की यात्रा की थी. वहीं उन्होंने पहली बार इस फल का अनोखा स्वाद चखा और इसके बड़े-बड़े बागों को करीब से देखा. पियरे ने वापस लौटकर अपने यात्रा वृतांत में लीची का जिक्र किया, जिससे पूरी दुनिया को इस रसीले फल के बारे में पता चला. इसके बाद साल 1764 में यह लीची फ्रांस के रियूनियन द्वीप तक पहुंची और वहां से मैडागास्कर, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों में फैलती चली गई.

पूर्वोत्तर के रास्ते भारत में आई लीची
दुनिया भर का चक्कर लगाने के बाद इस फल ने साल 1770 के आसपास चीन से सीधे भारत की धरती पर कदम रखा. लीची सबसे पहले भारत के पूर्वोत्तर इलाकों में आई थी और 1700 के आखिरी सालों में त्रिपुरा जैसे राज्यों में इसकी खेती विधिवत शुरू कर दी गई थी. इसके बाद धीरे-धीरे यह पौधा असम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बिहार के मुजफ्फरपुर तक आ पहुंचा. बिहार के किसानों के पास खेती के लिए काफी ज्यादा जमीन उपलब्ध थी, इसलिए यहां के लोगों ने लीची की खेती को बहुत तेजी से अपनाया और इसे बड़े पैमाने पर फैलाया.
मुजफ्फरपुर कैसे बना लीची नगरी?
बिहार में लीची के पहुंचने का समय साल 1800 के आसपास का माना जाता है. मुजफ्फरपुर के इलाके में आते ही इस फल को यहां की आबोहवा इतनी पसंद आई कि इसकी रिकॉर्ड तोड़ पैदावार होने लगी, जिसके चलते आज इस पूरे शहर को दुनिया भर में ‘लीची नगरी’ के नाम से जाना जाता है. लीची के अच्छे उत्पादन के लिए 5 से 7 पीएच (pH) मान वाली बलुई दोमट मिट्टी को सबसे बेहतरीन माना जाता है. बिहार की नदियों के आसपास की जमीन में यह सारे गुण प्राकृतिक रूप से मौजूद थे, जिसने इस फल की किस्मत ही बदल दी.
बिहार में ही लीची की ज्यादा पैदावार क्यों?
बिहार में लीची की सबसे ज्यादा पैदावार गंगा, गंडक और बूढ़ी गंडक जैसी बड़ी नदियों के मैदानी और तटीय इलाकों में होती है. इन नदियों के किनारे की मिट्टी में एक खास तरह की नमी और जरूरी खनिज पाए जाते हैं, जो लीची के फल को बड़ा और रसीला बनाने के लिए सबसे जरूरी हैं. मुजफ्फरपुर और उसके आस-पास के जितने भी प्रमुख जिले हैं, वे सभी इन नदियों के किनारे ही बसे हुए हैं. यही वजह है कि यहां उगने वाली शाही लीची का स्वाद और उसकी खुशबू दुनिया के किसी भी अन्य कोने से बिल्कुल अलग और लाजवाब होती है.
वैश्विक उत्पादन में भारत का जलवा
अगर पूरी दुनिया में लीची के कुल उत्पादन की बात करें तो भारत आज इस लिस्ट में दूसरे पायदान पर शान से खड़ा है, जबकि पहले नंबर पर इसका जनक चीन आता है. चीन में लगभग 800,000 हेक्टेयर की विशाल जमीन पर लीची की खेती की जाती है, जिससे हर सीजन में करीब 3.1 मिलियन टन लीची तैयार होती है. इसके मुकाबले भारत में लगभग 100,000 हेक्टेयर में ही इसकी खेती होती है और करीब 750,000 टन का उत्पादन होता है. हालांकि, अगर प्रति हेक्टेयर उत्पादकता की बात करें, तो कम जमीन होने के बावजूद भारत का औसत उत्पादन चीन से कहीं बेहतर है.
