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ऑपरेशनल लाइफ खत्म होने के बाद कहां जाते हैं पुराने लड़ाकू विमान, आखिर क्या होता है उनका?

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आसमान का सीना चीरकर देश की रक्षा करने वाले लड़ाकू विमानों की भी एक तय उम्र होती है. जब इन विमानों की ऑपरेशनल लाइफ यानी उड़ने की म्याद खत्म हो जाती है, तो इन्हें बड़े सम्मान के साथ सेवा से हटा दिया जाता है. पिछले साल 26 सितंबर, 2025 को लड़ाकू विमान मिग-21 (MiG-21) को भी इसी तरह विदाई दी गई थी. लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल कौंधता है कि रिटायरमेंट के बाद इन करोड़ों के विमानों का आखिर क्या होता है और इन्हें किस जगह ले जाया जाता है.

सक्रिय बेड़े से सीधे विशेष केंद्रों का सफर

वायुसेना से आधिकारिक तौर पर रिटायर होने के बाद लड़ाकू विमानों को नंबर-प्लेटेड यानी सेवा-मुक्त घोषित कर दिया जाता है. इसके तुरंत बाद ये विमान वायुसेना की सक्रिय लड़ाकू संपत्तियों की सूची से बाहर हो जाते हैं. सक्रिय सूची से हटने के बाद इन विमानों को एक खास प्रबंधित सूची में डाल दिया जाता है. इस प्रक्रिया के पूरा होते ही इन सभी पुराने लड़ाकू विमानों को वायुसेना के केंद्रीय भंडारण और निपटान केंद्रों तक सुरक्षित पहुंचा दिया जाता है, जहां इनकी अगली प्रक्रिया शुरू होती है.

कबाड़ नहीं बनते बल्कि फॉलो होता है प्रोटोकॉल

भारतीय वायुसेना अपने रिटायर हो चुके जांबाज लड़ाकू विमानों को सीधे कबाड़ के ढेर में नहीं फेंकती. इसके लिए सेना के पास एक बेहद सख्त और तय प्रोटोकॉल होता है, जिसका कड़ाई से पालन किया जाता है. जब कोई विमान पूरी तरह सेवा से मुक्त होकर निपटान केंद्र पर पहुंचता है, तो वायुसेना के तकनीकी विशेषज्ञों की देखरेख में सबसे पहले उस विमान से रडार, एवियोनिक्स (इलेक्ट्रॉनिक उपकरण), कॉकपिट के सभी जरूरी और महंगे यंत्र, हथियार प्रणाली और उसके शक्तिशाली इंजन को बहुत ही सावधानी से बाहर निकाल लिया जाता है.

पुराने विमानों के पार्ट्स का दोबारा इस्तेमाल

विमान के ढांचे से निकाले गए इन उपकरणों को बेकार नहीं समझा जाता, बल्कि काम के लायक पुर्जों को वायुसेना दोबारा अपने दूसरे सक्रिय विमानों में इस्तेमाल करती है. पार्ट्स की इसी उपयोगिता को पूरा करने के लिए भारत ने हाल ही में ओमान, फ्रांस और यूके (यूनाइटेड किंगडम) जैसे देशों से रिटायर हो चुके जगुआर लड़ाकू विमान मंगवाए थे, ताकि भारत में उड़ रहे जगुआर बेड़े के लिए स्पेयर पार्ट्स और उपकरणों का इंतजाम किया जा सके. ठीक इसी तरह, भारतीय वायुसेना भी अपने पुराने विमानों के सही पुर्जों को अपने मित्र देशों की मदद के लिए उन्हें सौंप सकती है.

 

 

उपयोगिता के आधार पर श्रेणियों का निर्धारण

केंद्रीय निपटान केंद्रों पर पहुंचने के बाद हर एक रिटायर विमान की तकनीकी जांच की जाती है. इस बारीक जांच के बाद विमानों को उनकी बची हुई उपयोगिता और कंडीशन के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांट दिया जाता है. इस वर्गीकरण के दौरान सैन्य अधिकारी यह तय करते हैं कि किस विमान को देश की ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संभाल कर रखना है, किस विमान का इस्तेमाल भविष्य की नई तकनीकों के परीक्षण या टेस्टिंग के लिए करना है, और किस विमान से केवल जरूरी पुर्जे निकालकर उसके बाकी हिस्से को स्क्रैप करना है.

गर्व और शौर्य के प्रतीक बनकर म्यूजियम में एंट्री

देश के लिए कई ऐतिहासिक युद्धों में हिस्सा ले चुके और दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले सभी लड़ाकू विमानों को कभी भी पूरी तरह तोड़ा नहीं जाता है. इतिहास रचने वाले कुछ चुनिंदा लड़ाकू विमानों को दिल्ली के पालम स्थित प्रसिद्ध एयरफोर्स म्यूजियम, विभिन्न एयरबेस, देश के मुख्य एयरपोर्ट्स या सेना के आर्मी स्कूलों में बड़े गर्व के साथ डिस्प्ले के लिए खड़ा किया जाता है. पिछले साल रिटायर हुए मिग-21 बेड़े में से भी एक-दो चुनिंदा लड़ाकू विमानों को हमेशा के लिए पालम के इसी म्यूजियम में जनता के देखने के लिए सुरक्षित रखा जाएगा.

हेरिटेज स्क्वाड्रन में उड़ते विंटेज विमान

सैन्य विमानन के इतिहास को जिंदा रखने के लिए वायुसेना कुछ खास और ऐतिहासिक रिटायर विमानों को विशेष देखरेख में बिल्कुल उड़ने लायक स्थिति में मेंटेन करके रखती है। इन विमानों को वायुसेना के हेरिटेज फ्लीट या हेरिटेज स्क्वाड्रन का हिस्सा बनाया जाता है. वायुसेना के बड़े आयोजनों और शानदार एयर शो के दौरान इन विंटेज लड़ाकू विमानों को आसमान में उड़ाकर पायलट अपनी पुरानी यादों और देश के गौरवशाली सैन्य इतिहास का प्रदर्शन करते हैं. मिग-21 के भी कुछ विमानों को इस खास हेरिटेज फ्लीट में शामिल करने की योजना है.

रेगिस्तान में बना लड़ाकू विमानों का कब्रिस्तान

जिन विमानों की हालत बेहद खराब होती है और जिनके पुर्जे किसी भी काम के नहीं बचते, उनके लिए बोनयार्ड यानी विमानों के कब्रिस्तान का विकल्प चुना जाता है. अमेरिका जैसे विकसित देश अपने हजारों पुराने सैन्य विमानों को खुले रेगिस्तानों में बने विशाल बोनयार्ड्स में खड़ा कर देते हैं, क्योंकि वहां की सूखी हवा के कारण लोहा जल्दी खराब नहीं होता. इसके अलावा, दुनिया के कुछ देश ऐसे भी हैं जो पूरी तरह बेकार हो चुके, बेहद पुराने और रेडियोधर्मी या खतरनाक तत्वों से लैस लड़ाकू विमानों के ढांचों को सुरक्षा के लिहाज से सीधे रेगिस्तान की रेतीली जमीनों के अंदर हमेशा के लिए दफना देते हैं.

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