Tamil Nadu Politics: तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के बाद राजनीतिक स्थिति काफी ज्यादा ऊपर नीचे हो रही है. दरअसल चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाई. विजय और उनकी पार्टी टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन इसके बावजूद भी वह बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई. कांग्रेस के समर्थन के बाद भी विजय की सीटों की संख्या कथित तौर पर बढ़कर 113 हो गई है. सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर से दो बार मुलाकात करने के बावजूद उन्हें अभी तक सरकार बनाने का निमंत्रण नहीं मिला है. आइए जानते हैं कि क्या विजय राज्यपाल के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकते हैं?
क्या राज्यपाल के फैसले को चुनौती दी जा सकती है?
संवैधानिक रूप से राज्यपाल के फैसले को चुनौती दी जा सकती है. राज्यपाल के कार्य पूरी तरह से न्यायिक समीक्षा से परे नहीं होते. हालांकि सरकार बनाने के मामले में राज्यपालों के पास विवेकाधीन शक्तियां होती हैं. लेकिन अगर उन शक्तियों का इस्तेमाल मनमाने ढंग से या फिर असंवैधानिक तरीके से किया जाता है तो वह न्यायिक समीक्षा के अधीन होती हैं.
अगर कोई राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी के नेता को बहुमत साबित करने का मौका दिए बिना ही नजरअंदाज कर देता है तो प्रभावित पार्टी उच्च न्यायालय या फिर भारत के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है. ऐसे मामले में मुख्य तर्क यह होगा कि राज्यपाल ने अनुचित तरीके से काम किया है.

विजय का सबसे मजबूत कानूनी तर्क
अदालतों द्वारा स्थापित सबसे जरूरी सिद्धांत में से एक यह है कि बहुमत का परीक्षण विधानसभा के पटल पर होना चाहिए ना कि सिर्फ राजभवन के अंदर इसका फैसला किया जाना चाहिए. इस वजह से विजय की पार्टी अदालत से यह निर्देश देने का अनुरोध कर सकती है कि राज्यपाल फ्लोर टेस्ट करवाएं. 1994 में आए ऐतिहासिक एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ फैसले के बाद सिद्धांत को संवैधानिक रूप से ज्यादा महत्व मिला था.
उस फैसले में इस बात पर जोर दिया गया था कि बहुमत के समर्थन से जुड़े सवालों का निपटारा किसी व्यक्ति की अपनी राजनीतिक सोच या फिर आकलन के आधार पर नहीं बल्कि विधानसभा में मतदान के जरिए से ही किया जाना चाहिए.
