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UN Failure: रूस-यूक्रेन से लेकर इजरायल-ईरान तक… कब-कब बुरी तरह फेल हुआ संयुक्त राष्ट्र संघ?

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बीते कुछ सालों में संयुक्त राष्ट्र को बड़े वैश्विक संघर्षों को रोकने या सुलझाने में अपने नाकामी के लिए कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है. रूस यूक्रेन के एक लंबे युद्ध से लेकर मिडल ईस्ट में इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तक संयुक्त राष्ट्र की सीमा बार-बार उजागर हुई है. इस नाकामी के केंद्र में एक काफी बड़ी समस्या है. आइए जानते हैं क्या है यह समस्या और इतिहास में संयुक्त राष्ट्र कितनी बार नाकाम हुआ है.

रूस यूक्रेन युद्ध 

2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से संयुक्त राष्ट्र प्रभावी कार्रवाई करने के लिए संघर्ष कर रहा है. दरअसल मुद्दा यह है कि रूस खुद सुरक्षा परिषद का एक स्थायी सदस्य है. इससे उसे अपने काम के खिलाफ किसी भी कड़े प्रस्ताव को वीटो करने की अनुमति मिल जाती है. यहां तक कि जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2026 में शांति प्रस्ताव पारित किए तो वे काफी हद तक प्रतीकात्मक ही थे. बड़े देशों ने या तो मतदान में हिस्सा नहीं लिया या फिर कोई कड़ा रुख अपनाने से परहेज किया. इससे उनका प्रभाव कमजोर पड़ गया.  इन सबके अलावा ब्लैक सी ग्रेन इनीशिएटिव जैसी मानवीय पहल तब ठप पड़ गई जब रूस ने इससे हाथ खींच लिया.

इजरायल-ईरान और गाजा 

मिडिल ईस्ट की स्थिति में निर्णायक कार्रवाई करने में संयुक्त राष्ट्र की नाकामी को और भी बड़े पैमाने पर दिखाया. गाजा में चल रहे संघर्ष में संयुक्त राज्य अमेरिका ने स्थायी संघर्ष विराम के प्रस्ताव को रोकने के लिए बार-बार अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल किया है.

जब 2026 में ईरान और इजरायल के बीच तनाव बढ़ा तब संयुक्त राष्ट्र तनाव कम करने में कोई सार्थक भूमिका निभाने में नाकाम रहा. निंदा और चर्चा के बावजूद जमीन पर संघर्ष जारी रहा. यहां तक कि सुरक्षा परिषद के आधिकारिक बयान से भी घटनाओं के रूप में कोई खास बदलाव नहीं आया.

 

 

रवांडा का नरसंहार 

इसे यूनाइटेड नेशन के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है. दरअसल रवांडा में सिर्फ 100 दिनों के अंदर ही लगभग 8 लाख लोग बेरहमी से मारे गए थे. संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिक महापुर मौजूद थे लेकिन उन्हें हिंसा को रोकने के लिए जनादेश नहीं दिया गया था. जब यह नरसंहार अपनी चरम सीमा पर था तब यूनाइटेड नेशंस ने अपने सैनिकों की संख्या कम कर दी.

श्रीलंका गृहयुद्ध 

2009 में श्रीलंकाई सेना और लिट्टे के बीच युद्ध के अंतिम महीनों में संयुक्त राष्ट्र पर नागरिकों की सुरक्षा ना कर पाने के गंभीर आरोप लगे.  आरोप है कि युद्ध के आखिर दौर में लगभग 40000 नागरिक मारे गए लेकिन संयुक्त राष्ट्र वहां से अपनी टीम हटा चुका था.

सीरियाई गृहयुद्ध 

सीरिया में एक दशक से ज्यादा समय से चल रहे युद्ध में लाखों लोग मारे गए हैं. दरअसल यहां पर भी वीटो पावर को सबसे बड़ी बाधा माना जा रहा है. रूस और चीन ने सीरिया की सरकार के खिलाफ आने वाले कई कड़े प्रस्ताव को ब्लॉक किया.

कंबोडियाई नरसंहार 

1975 से 1979 तक चला यह नरसंहार काफी भयानक था. खमेर रूज शासन के दौरान कंबोडिया में करीब 20 लाख लोग मारे गए थे. संयुक्त राष्ट्र ने सालों तक इस शासन को मान्यता दी और नरसंहार को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया.

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