Kohinoor History: कोहिनूर, यानी ‘रोशनी का पहाड़’. यह नाम सुनते ही दुनिया के सबसे बेशकीमती और रहस्यमयी हीरे की तस्वीर जेहन में उभर आती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि सदियों तक भारत की शान रहा यह हीरा कैसे एक ईरानी चरवाहे के हाथ लगा और किस तरह इसने सदियों का लंबा सफर तय किया? यह सिर्फ एक पत्थर की कहानी नहीं, बल्कि सल्तनतों के उत्थान-पतन और छल-कपट की एक ऐसी दास्तान है, जो आज भी इतिहास के पन्नों में उतनी ही जीवंत है. आइए जानते हैं उस ऐतिहासिक पल के बारे में, जब कोहिनूर भारत से निकलकर विदेशी सीमाओं में कैद हो गया था.
औरंगजेब का पोता और मुगल दरबार की विलासिता
18वीं सदी की शुरुआत में दिल्ली के तख्त पर औरंगजेब का पोता मोहम्मद शाह रोशन अख्तर बैठा था, जिसे इतिहास ‘रंगीला’ के नाम से जानता है. वह अपनी विलासी जीवनशैली और प्रशासन के प्रति बेपरवाही के लिए मशहूर था. उस दौर में मुगल दरबार अपनी अपार धन-संपदा, सोने-चांदी के जखीरे और मयूर सिंहासन के लिए दुनिया भर में मशहूर था. कोहिनूर इसी बेशकीमती खजाने का सबसे चमकता हुआ हिस्सा था. बादशाह की यही असावधानी और मुगल साम्राज्य की आंतरिक कमजोरी ईरान के एक महत्वाकांक्षी योद्धा की नजरों से छिपी नहीं रही, जो किसी भी कीमत पर हिंदुस्तान के वैभव को हथियाना चाहता था.

नादिर शाह का उदय और दिल्ली पर प्रहार
ईरान का शासक नादिर शाह, जो मूलतः एक चरवाहे का बेटा था, अपनी अद्भुत युद्ध कला, वाकपटुता और क्रूरता के बल पर सम्राट बना था. 1739 में, उसने धन की भूख और साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा के साथ भारत पर आक्रमण कर दिया. करनाल की निर्णायक लड़ाई में नादिर शाह की मजबूत सेना ने मुगल सैनिकों को आसानी से धूल चटा दी. इसके बाद नादिर शाह ने दिल्ली में प्रवेश किया, जहां उसने कत्ल-ए-आम मचाया और पूरे शहर को लूट लिया. उसने मुगल महल को अपना अड्डा बना लिया और तब तक वहां से नहीं हटा जब तक उसने खजाने का आखिरी कोना नहीं छान लिया.
