रावघाट से रायपुर तक रेल लाइन लगभग तैयार, विकास या केवल खनिज दोहन का रास्ता?

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बस्तर/ 18 अगस्त बस्तर संभाग की बहुप्रतीक्षित रावघाट-रायपुर रेल परियोजना लगभग अपने अंतिम चरण में है। बताया जा रहा है कि इस महत्वाकांक्षी रेललाइन का 97% कार्य पूर्ण हो चुका है, और दिसंबर 2025 तक इस मार्ग पर यात्री ट्रेन चलने की संभावना है।

यह रेल मार्ग कांकेर, नारायणपुर, बालोद, दुर्ग और रायपुर जिलों को जोड़ेगा, जिससे परिवहन सुविधा बेहतर होने की उम्मीद है। लेकिन सवाल यह है कि यह रेल लाइन वास्तव में किसके लिए बनाई गई है?

असल उद्देश्य – खनिज संपदा का दोहन?

सूत्रों और विश्लेषकों के अनुसार, इस रेल परियोजना का प्रमुख उद्देश्य भिलाई स्टील प्लांट को रावघाट खदान से आयरन ओआर सप्लाई करना है। चूंकि दल्ली-राजहरा की खदानें अब लगभग समाप्त हो चुकी हैं, इसलिए अब भिलाई को आयरन की निर्बाध आपूर्ति के लिए रावघाट को जोड़ा जा रहा है।

रेलमार्ग पर यात्री ट्रेनें चलाकर इसे जनहित की योजना के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन मालगाड़ियों की आवागमन प्राथमिक होगा — यह अब खुला रहस्य है।

बस्तर के आदिवासियों को क्या मिलेगा?

बड़ा सवाल यह है कि बस्तर संभाग की इन विशाल खनिज परियोजनाओं में आदिवासी समाज की हिस्सेदारी क्या होगी?
क्या उन्हें इन खदानों में कोई स्वामित्व, मुनाफा या रोजगार मिलेगा?
क्या कोई सहकारी समिति बनाकर स्थानीय आदिवासियों को खनिज संपदा का प्रबंधन सौंपा जाएगा?

भारत सरकार तकनीकी रूप से इन खदानों की मालिक है, लेकिन बस्तर के मूल निवासी सदियों से इन जंगलों, पहाड़ों और खनिजों पर निर्भर रहे हैं।
अगर उनके बिना ही यह विकास आगे बढ़ता है, तो यह एकतरफा विकास होगा — जो सामाजिक असंतुलन को जन्म देगा।

सड़कें, रेल लाइनें – या खनिज ढुलाई के रास्ते?

बस्तर से होकर गुजरने वाली नई सड़कें और रेलमार्ग, जो तेलंगाना, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश से जुड़ते हैं, उनके पीछे भी यही मंशा देखी जा रही है — खनिज और कोयले की सुगम ट्रांसपोर्टिंग

जब इन खदानों को दिल्ली, गुजरात और छत्तीसगढ़ के उद्योगपतियों को सौंपा जाएगा — जैसा कि कुछ को पहले ही दिया जा चुका है — तो इनका लाभ किसे होगा?

2026 – नक्सल मुक्त बस्तर, लेकिन क्या न्यायपूर्ण विकास?

सरकार का दावा है कि 31 मार्च 2026 तक नक्सली गतिविधियों का खात्मा हो जाएगा।
यह बस्तर की शांति और सुरक्षा के लिए एक स्वागत योग्य कदम है।
लेकिन शांति के बाद सवाल रहेगा — विकास किसका?

क्या यह विकास केवल खनिज कंपनियों, बड़े उद्योगों और शहरी पूंजीपतियों का होगा?
या इसमें स्थानीय आदिवासियों की भागीदारी, सम्मान, और हिस्सेदारी भी सुनिश्चित की जाएगी?

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