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कौड़ी दमड़ी से लेकर ढेला और फिर रुपये तक का सफर, जानिए कैसे आई भारतीय मुद्रा में क्रांति?

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आज हम मोबाइल से एक क्लिक में पेमेंट कर देते हैं. ना सिक्कों की खनक सुनने को मिलती है, ना नोटों की गिनती करने की जरूरत पड़ती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत में पैसे का यह आसान सिस्टम कैसे बना. भारतीय मुद्रा का इतिहास हजारों साल पुराना है. यह सिर्फ पैसों का बदलाव नहीं, बल्कि हमारे समाज, व्यापार और सोच के विकास की कहानी है. कभी लोग समुद्र से मिलने वाली छोटी-सी कौड़ी से सामान खरीदते थे, और आज हम डिजिटल पेमेंट कर रहे हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि कौड़ी दमड़ी से लेकर ढेला और फिर रुपये तक का सफर क्या है और भारतीय मुद्रा में क्रांति कैसे आई.

कौड़ी दमड़ी से लेकर ढेला और फिर रुपये तक का सफर क्या है?

1. जब कौड़ी ही पैसा थी – बहुत पुराने समय में भारत में सिक्के नहीं होते थे. उस समय लोग कौड़ी को ही पैसा मानते थे. ये छोटी-छोटी सीपियां समुद्र से मिलती थीं. इन्हें गिनकर सामान खरीदा जाता था. ज्यादा कौड़ियां का मतलब ज्यादा कीमत से होती थी, इसी वजह से आज भी हम कहते हैं कि फूटी कौड़ी की कीमत नहीं, यह दौर उस समय मुद्रा की कीमत उसकी उपलब्धता पर निर्भर करती थी.

2. दमड़ी और  ढेला – जैसे-जैसे व्यापार बढ़ा, लोगों को मजबूत और टिकाऊ मुद्रा की जरूरत पड़ी, तब धातु के सिक्के आए . जिसमें दमड़ी तांबे का छोटा सिक्का होता था और ढेला दमड़ी से भी छोटा होता था. इनका इस्तेमाल रोजमर्रा की छोटी खरीदारी में होता था. गांवों और छोटे बाजारों में ये बहुत आम थे.

 

 

3. सुल्तान और मुगल काल – दिल्ली सल्तनत के समय सिक्कों पर शासकों के नाम और अरबी लिखावट आने लगी. इससे मुद्रा पर भरोसा बढ़ा. मुगल काल में बदलाव हुआ,  अकबर ने मुद्रा व्यवस्था को और बेहतर बनाया. जिसमें चांदी का रुपया, तांबे का दाम और सोने का मुहर शामिल हुए. यहीं से रुपया मजबूत रूप में सामने आया.

4. रुपये का सफर –  भारतीय रुपये की असली नींव शेरशाह सूरी के शासनकाल में पड़ी, जब उन्होंने पहली बार एक तय वजन और शुद्धता वाला चांदी का रुपया चलाया, जिससे व्यापार में भरोसा और एकरूपता आई. इससे पहले अलग-अलग तरह के सिक्के चलते थे, लेकिन उनके इस सुधार ने लेनदेन को आसान और विश्वसनीय बना दिया.

5. नोटों की शुरुआत – मुगल काल में भी रुपया, आना और दमड़ी प्रचलन में रहे, जिससे यह व्यवस्था और मजबूत हुई फिर ब्रिटिश काल में 1861 में कागजी नोटों की शुरुआत हुई और मुद्रा प्रणाली को नया रूप मिला. आजादी के बाद 1957 में दशमलव प्रणाली लागू होने पर 1 रुपया 100 पैसा तय किया गया, जिससे पुरानी इकाइयां खत्म हो गईं. वहीं नए नोटों पर गांधी जी और राष्ट्रीय प्रतीक आने लगे.

भारतीय मुद्रा में क्रांति कैसे आई?

21वीं सदी में भारत ने डिजिटल पेमेंट के रूप में एक बड़ा बदलाव देखा, जहां नोटबंदी 2016 और GST लागू 2017 जैसे कदमों ने लेनदेन के तरीके को पूरी तरह बदल दिया और UPI, मोबाइल ऐप्स व कार्ड पेमेंट के जरिए लोग तेजी से कैशलेस होते गए.आज ज्यादातर लोग नकद की जगह डिजिटल तरीके से भुगतान करना पसंद करते हैं.

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