Fighter Plane Ejection Seat: जब आसमान में कोई लड़ाकू विमान दुश्मन की मिसाइल का शिकार होता है या उसमें तकनीकी खराबी आती है, तब पायलट के पास अपनी जान बचाने के लिए चंद सेकंड का ही समय होता है. ईरान द्वारा हाल ही में अमेरिकी जेट्स को मार गिराने के दावे के बीच, इजेक्शन सीट तकनीक फिर चर्चा में है. यह महज एक कुर्सी नहीं, बल्कि पायलट का आखिरी सुरक्षा कवच है, जो आग के गोले बन चुके विमान से उसे सुरक्षित बाहर निकालती है. आइए जानें कि क्या भारत में भी फाइटर प्लेन की इजेक्शन सीट बनती है.
फाइटर प्लेन में इजेक्शन सीट की क्या है भूमिका?
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान लड़ाकू विमानों की सुरक्षा तकनीक की ओर खींचा है. हाल ही में ईरान ने दावा किया कि उसने अमेरिकी F-15 ईगल और A-10 वारथॉग विमानों को मार गिराया है. इस घटना में A-10 के पायलट ने खाड़ी के ऊपर समय रहते इजेक्ट कर लिया, जिससे उसकी जान बच गई. यह पूरी प्रक्रिया इजेक्शन सीट की बदौलत ही संभव हो पाई. इजेक्शन सीट का काम सिर्फ पायलट को बाहर फेंकना नहीं है, बल्कि एक निश्चित ऊंचाई पर ले जाकर सुरक्षित तरीके से पैराशूट खोलना भी है.
क्या है इजेक्शन सीट की बेजोड़ इंजीनियरिंग?
एक फाइटर प्लेन की सीट साधारण सीटों से बिल्कुल अलग होती है. इसे एक जटिल रॉकेट-संचालित सिस्टम के रूप में डिजाइन किया जाता है. जब पायलट इजेक्शन लीवर खींचता है, तो विमान का कॉकपिट कवर (कैनोपी) उड़ जाता है और सीट के नीचे लगे रॉकेट मोटर उसे जबरदस्त थ्रस्ट के साथ बाहर धकेलते हैं. इसमें सेंसर, छोटे विस्फोटक चार्ज और थ्रस्ट बैलेंसिंग जैसी एडवांस तकनीक का इस्तेमाल होता है. यह तकनीक इतनी सटीक होती है कि पायलट को विमान के मलबे से टकराने से बचाते हुए सुरक्षित वायुमंडल में पहुंचा देती है.

क्या भारत में भी बनती है इजेक्शन सीट?
भारत रक्षा क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भर बन रहा है, लेकिन इजेक्शन सीट के मामले में हम अब भी विदेशी तकनीक पर निर्भर हैं. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने तेजस जैसे विमानों के लिए सीटों पर काफी रिसर्च की है, लेकिन पूरी तरह से स्वदेशी इजेक्शन सीट सिस्टम अभी भी विकास के चरण में है. भारत वर्तमान में अपने लड़ाकू विमानों के लिए विदेशी कंपनियों से समझौते करता है. डीआरडीओ (DRDO) और एचएएल इस दिशा में काम कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा मानकों की सख्ती के कारण इसमें समय लग रहा है.
इजेक्शन सीट का बादशाह कौन?
इजेक्शन सीट बनाने की दुनिया में ब्रिटेन की कंपनी मार्टिन-बेकर (Martin-Baker) का कोई सानी नहीं है. इसे इस क्षेत्र का बेताज बादशाह माना जाता है. भारत के स्वदेशी फाइटर जेट ‘तेजस’ से लेकर मिग और रफाल जैसे विमानों में इसी कंपनी की सीटों का इस्तेमाल होता है. मार्टिन-बेकर के अलावा रूस की NPP Zvezda और अमेरिका की Collins Aerospace भी इस रेस में शामिल हैं, लेकिन मार्टिन-बेकर का ट्रैक रिकॉर्ड और विश्वसनीयता उन्हें नंबर-1 बनाती है. इस कंपनी की सीटों ने अब तक हजारों पायलटों की जान बचाई है.
भारत में इजेक्शन सीट बनाने की चुनौतियां
इजेक्शन सीट विकसित करना किसी नए विमान को बनाने जितना ही चुनौतीपूर्ण है. इसे टॉप सीक्रेट डिफेंस टेक्नोलॉजी की श्रेणी में रखा जाता है, जिसे कोई भी देश आसानी से साझा नहीं करता है. एक सीट को प्रमाणित करने के लिए उसे सैकड़ों कड़े परीक्षणों से गुजरना पड़ता है. चाहे वह अत्यधिक ऊंचाई का कम तापमान हो या सुपरसोनिक स्पीड का दबाव, हर परिस्थिति में इसका सफल होना अनिवार्य है. जरा सी चूक का मतलब पायलट की जान जाना होता है, इसलिए भारत इस तकनीक के परीक्षण में कोई जल्दबाजी नहीं कर रहा है.
कितनी होती है एक इजेक्शन सीट की कीमत?
इजेक्शन सीट की जटिलता का अंदाजा इसकी कीमत से लगाया जा सकता है. एक इजेक्शन सीट की कीमत लगभग 1.02 करोड़ रुपये से लेकर 3.3 करोड़ रुपये तक होती है. यह कीमत विमान के मॉडल और उसमें लगी अत्याधुनिक तकनीक के आधार पर बदलती रहती है. यह महंगा सिस्टम इसलिए जरूरी है, क्योंकि एक कुशल लड़ाकू पायलट को तैयार करने में सरकार करोड़ों रुपये और कई साल खर्च करती है. ऐसे में पायलट की जान बचाना किसी भी विमान की कीमत से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होता है.
